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    यहीं बजना है जीवन संगीत

    (यहीं जड़ों और उड़ानों के बीच हमें निरंतर मंजना है)

     

     

    चलना होगा

    धरती की चाल से आगे

    निकलना होगा जड़ों से

    फूटकर अंकुराते हुए ऊपर,

    भू पर।

     

    फिर है अनंत आकाश

    चाहे जितना बढ़ें,

    लेकिन बढ़ने की

    सीमा तय करती हैं जड़ें।

    धरती भी शामिल होती है

    जड़ की योजनाओं में

    क्योंकि वृक्ष को

    पकडक़र तो वही रखती है,

    एक सीमा तक ही

    बढ़ाती है वृक्ष को

    क्योंकि फलों का स्वाद चखती है।

     

    डाल पर बैठा परिन्दा

    ऊंचाइयों से जुड़ेगा,

    अपनी ऊर्जाभर उड़ेगा।

    उसे वृक्ष नहीं रोकता

    रोकती हैं जड़ें,

    पंख जब मुश्किल में पडें,

    तो उन्हें इसी बात को

    समझना है,

    कि धरती पर

    जड़ों और उड़ानों के बीच

    निरंतर मंजना है।

     

    यहीं बजना है जीवन संगीत

    यहीं समय का रथ सजना है,

    यहीं चलना है उसे

    इस चिंता के बिना

    कि समय के अनेक रथों में

    एक रथ बादल भी है

    जिसका काम

    उड़ने के साथ-साथ गरजना है।

     

    wonderful comments!

    1. Vishwat Sen Apr 10, 2012 at 6:58 pm

      प्रेरक, उत्‍प्रेरक और एक...अच्‍छा सा जवाब। धन्‍यवाद एवं आभार। सादर प्रणाम। आपका विश्‍वत सेन समाचार संपादक इतवार हिन्‍दी साप्‍ताहिक पत्रिका नई दिल्‍ली। 9891823993

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