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व्यापार और राजनीति का अपावन गठबंधन

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व्यापार और राजनीति का अपावन गठबंधन

—चौं रे चम्पू! और सुना! कोई नई ताजी खबर है तेरे पास?

—चचा, हमारा देश इतना बड़ा है कि ख़बर तो हर पल की बन सकती हैं, पर जिन मुद्दों को प्राथमिकता देकर ख़बर बनाना चाहिए, उनसे बेख़बरी रहती है। असममें दो लाख बेघर हो गए, कितने गांव जला दिए गए, कितने निरीह मारे गए, इसकी ख़बर बहुत कम मिलेंगी। लोग भी नहीं जानना चाहते कि कारण क्या हैं, क्योंकि बड़ी सरलीकृत व्याख्याएं देकर समस्या से पिंड छुड़ा लिया जाता है चलो छोड़ो समस्या को! मनुष्य़ता के नाम पर मनुष्य़ के लिए, फिलहाल क्या हो रहा है वहां, यही बताओ! कितने सहायता शिविर होने चाहिए, कुल कितने कैम्प हैं? क्या सुविधाएं हैं वहां? कितने लोग मारे गए, कितने मरणासन्न हैं? इस संदर्भ की ख़बर जिस मात्रा में होनी चाहिए, उस मात्रा में हैं कहां? बस आसान सी एक बात कह कर विकराल समस्या से मुंह मोड़ लो।

—तेरी आसान बात हमाई समझ में ई नायं आई।

—चचा मैंने कहा था सरलीकरण। साम्प्रदायिकता किसी को अच्छी नहीं लगती। साम्प्रदायिकता उतनी होती भी नहीं है। असम के बोडो आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हिंसा भड़की। उसके क्या आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारण थे, मूल में तो गए नहीं, सतही सूचनाओं से सांप्रदायिकता की राजनीति अंगड़ाई लेनेलगी। खबरें और रपटें इस हिंसा को, असम के हिंदुओं पर घुसपैठिया मुसलमानों का आक्रमण बताने लगीं। ख़बरें अगर मुसलमान और शरणार्थी-विरोधी माहौल तैयार करेंगी तो क्या परिणाम हो सकते हैं, सोचा है! अंजाम बेहद ख़तरनाक होंगे चचा। ये सरलीकरण है और गरलीकरण भी। ख़बर में ज़हर मिलाने का काम। अरेभैया, थोड़ा दिमाग़ से भी काम लो। सोचो, कौन स्थापित है, कौन विस्थापित है। सोचो, जो पचास साल पहले तुम्हारे देश में आए, आज उसके बाल-बच्चे हैं। वोबच्चे इसी देश में जन्मे, जवान हुए और अपना पेट पालने के साथ अपनी मेहनत-मशक़्क़त से देश को भी पालने लगे, उन्हें किस मुंह से घुसपैठिया कहोगे? क्याक़ानून है, क्या मानवता है,

कौन दोषी है, कौन आरोपी है, ढंग से समझाओ तो सही। ज़मीन-हड़पू रेटों और कॉरपोरेटों के इरादों पर गहरी निगाह डालोगे तो समझआएगा। कैसे-कैसे आरोप हैं! अजी, उन्हें इसलिए आने दिया गया ताकि यहां उनके बच्चे हों और वो बच्चे बड़े होकर अमुक पार्टी को वोट डालें

और उन्हें सत्तामें बने रहने में मदद मिले। बहुत दूर की कौड़ी लाते हैं लोग भी।

—तौ का विदेसिन कूं घुसन दैं अपने देस में?

—चचा वह बात नहीं है, जितने भी बड़े देश है, क्या उनकी आबादी उन्हीं के मूल लोगों से बसी है। पूरे अमरीका में पूरी दुनिया के लोग बसे हैं। ऑस्ट्रेलिया मेंअगर देखो तो आदिवासियों को ही रहना चाहिए, पर क्यों अन्य देशों के लोग हैं वहां पर। संक्रमण काल में असम के आदिवासियों के साथ अन्याय हुआ, लेकिनजिन्होंने अन्याय किए वे तो नेपथ्य में हैं। दोषी ठहराया जा रहा है सिर्फ विस्थापितों शरणार्थियों को। किसी भी स्थान के मूल निवासी बड़े सभ्य, सौम्य औरभोले होते हैं। उनके भोलेपन का शिकार कर लेती हैं स्वार्थी और लालची निगाहें। ख़ासकर व्यापारी। जिन्होंने उनके जल, जंगल और ज़मीन के हुक़ूक हड़प लिए।अपना व्यापार जमा लिया। अगर व्यापारी हिंदीभाषी क्षेत्र से गए हैं तो मूल निवासी घबराने लगे उनकी भाषा से भी। नफरत नहीं करेंगे तो क्या करेंगे। जबतक पैसा आता रहे व्यापारी हिंसा नहीं चाहता। गड़बड़ वहां होती है जहां व्यापार और राजनीति का अपावन गठबंधन हो जाता है। समस्या को अवांछित मोड़ देदिया जाता है।

—तौ मूल समस्या का ऐ रे?

—मूल समस्या है बोडो आदिवासियों के अधिकारों की, जिन्हें दशकों से अनदेखा करते हुए ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जैसे मुसलमान ही इस हिंसा के लिए एकमात्र ज़िम्मेदार हों। ख़बरों की राजनीति किसी के पक्ष में नहीं है, न मुसलमानों के पक्ष में, न आदिवासियों के, न हिंदुओं के। जल, जंगल और ज़मीन परकॉरपोरेटी वर्चस्ववराज कायम रहे बस, माजरा है ये। ख़बरों को सांप्रदायिक रंगाई-पुताई करके रफा-दफा करो। असम समस्या कभी हिंदू मुसलमान सांप्रदायिकता की समस्या नहीं रही, पर बना दो। तुम्हारा क्या जाता है!


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