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विजय कुमार जी हमें भा गए

विजय कुमार जी हमें भा गए     

—चौं रे चम्पू! राजेन्द्र यादव चले गए, के. पी. सक्सेना चले गए, उनके किस्सा कब सुनायगौ?

—चचा, उनके क़िस्से सब जानते हैं। एक प्यारे व्यक्ति और चले गए, जिनका जाना, किसी ने नहीं जाना। विजय सोनी!

—विजय सोनी कौन हते?

—लेखक, चित्रकार, इप्टा से जुड़े रंगकर्मी, विजय सोनी। बड़े प्यारे व्यक्ति थे। अब से चालीस साल पहले जब मैं एम. लिट. करते हुए, गजानन माधव मुक्तिबोध कीकविताओं की रचना-प्रक्रिया पर काम कर रहा था, तब टी हाउस, कॉफ़ी हाउस, मोहन सिंह प्लेस में अक्सर मिलते थे। लंबे, चौड़े, धीर-गंभीर व्यक्तित्व के मालिक।मुक्तिबोध की कविताओं पर आधारित एक नाटक भी उन्होंने तैयार किया था। संयोग की बात ये देखिये चचा कि लोदी रोड के श्मशान घाट पर जब राजेन्द्र यादव जीके अंतिम संस्कार के लिए सैंकडों लोग उपस्थित थे, वहीं दूसरी छतरी के नीचे एक और पार्थिव शरीर था। किसी ने मुझे बताया कि उधर विजय सोनी लेटे हुए हैं। विजय सोनी!! लगभग तीस साल बाद जैसे कोई साकार खड़ा हो गया मेरे सामने। पर वह तो लेटा हुआ था। सफेद कपड़े में लिपटा हुआ। चंद गैंदे की मालाओं से बंधा।

—और लोगन्नैं पतौ नायं चली?

—समय निष्ठुर होता है चचा! अधिकांश के लिए विजय सोनी एक अनचीन्हा सा, अनजाना सा नाम था। कुछ ही लोग थे सत्तर के दशक के प्रगतिशील, जो विजयसोनी को जानते थे, वे भी पार्थिव शरीर को प्रणाम करके यादव जी की भीड़ में विलीन हो गए, क्योंकि उधर लेखकों का तारामंडल था, मीडिया था, कैमरे में कुछ बोलदेने को ललकित पंक्तिबद्ध सिद्ध थे।

—और सोनी जी के संग?

—इधर कुल मिलाकर उनके परिवार-परिकर के आठ-दस सदस्य रहे होंगे। छतरी के खम्बे से पीठ टिकाए एक वृद्ध महिला बैठी हुई थीं। मैंने परिजनों में किसी से पूछा,उनकी मां हैं क्या? उत्तर मिला, नहीं उनकी पत्नी हैं। ओह! मैं लज्जित हुआ। मेरे ज़ेहन में तो विजय जी की तीस साल पहले की ही छवि थी। जैसे उसके बाद उनकीउम्र बढ़ी ही न हो। पत्नी, यानी पोलिश विदुषी आग्न्येष्का सोनी! अब मैंने उन्हें ग़ौर से देखा। जिनसे मैं चालीस साल पहले मिलना चाह रहा था यह जानने के लिए किमुक्तिबोध और उनके बीच इकसठ से चौंसठ के बीच क्या पत्राचार हुआ था। विजय जी से सुनता था कि मुक्तिबोध जी ने उनकी पत्नी को गम्भीरसाहित्यिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों पर लम्बे-लम्बे पत्र लिखे हैं। वे पत्र मुझे अपने शोधकार्य के दौरान तो नहीं, मुक्तिबोध रचनावली प्रकाशित होने केबाद सन अस्सी में पढ़ने को मिले।  बहरहाल, आग्न्येष्का सोनी सामने बैठी थीं। जैसे, सफ़ेद आधार की कलफ़दार उडिया साडी में, हाथ में हाथी दाँत जैसी चीज़ के कंगन डाले, उंगलियों में मोटी-मोटी चांदी की अंगूठियां पहने, श्वेत बिखरे केशों को नियंत्रित करने के लिए काले चश्मे को ऊपर चढ़ाए हुए, गौर वर्ण चेहरे पर ख़ूब सारीअनुभवजन्य झुर्रियां समेटे, एक परिनिष्ठित सौन्दर्याभिरुचि की नि:संग और भव्य उदासी बैठी हो। मैंने उन्हें प्रणाम किया, वे दुख में भी मुस्कुराईं। पति के जाने कीतकलीफ़ उनके झुर्रीदार चहरे से जैसे कह रही हो, जाना तो सभी को होता है। चचा, मुक्तिबोध जी के उन्तीस मई सन तिरेसठ के एक पत्र में विजय सोनी का उल्लेखभी था।

—का लिख्यौ उन्नैं?

—पढ़कर सुनाता हूं। उन्होंने लिखा, ‘मुझे इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर करने का मौक़ा दीजिए कि विजय कुमार जी हमें भा गए। उनका चित्र देखते ही लगा कि आपकाचुनाव सही रहा। उनका व्यक्तित्व सचमुच मोहक और भावनापूर्ण है। वे सौभाग्यशाली हैं कि आप जैसी पत्नी उन्हें प्राप्त हुईं। हम आप दोनों की राह देखते रहेंगे।आपके व्यक्तित्व को देखते हुए हमें पूर्वाभास भी हो जाना चाहिए था कि आप भारतीय बन जाएंगी। ईश्वर आप दोनों को आजीवन सुखी रखे और दोनों मिलकर अपनीऔर दूसरों की संसार-यात्रा को सुखी बनाएं। यही मैं चाहता हूं।’ इसके बाद पत्र में भारतीय समाज और संस्कृति से जुड़े अनेक मुद्दे हैं। पचास साल पुराना पत्र हैचचा।

—सब कल्ल की सी बात लगें लल्ला! काई दिना मिलि कै आ उन्ते।

—हां चचा! अभिनेता सतीश सहगल से उनकी पुत्री चारु का नंबर तो मिला है। असग़र वजाहत के साथ जाऊंगा। कोशिश करूंगा इसी हफ़्ते।

 


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