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विद्वानो की भाषा में शक्ति नहीं होती

विद्वानो की भाषा में शक्ति नहीं होती

—चौं रे चम्पू! कहां ते आय रह्यौ ऐ?

—चचा, एक फ़िल्म-श्रृंखला के लिए कॉमेंट्री करके आ रहा हूं। बहुत दिन बाद फ़िल्मों को अपना स्वर दिया तो अच्छा लगा। कॉमेंट्री जानते हैं आप?

—चौं! नायं जानिंगे का? किरकिट में होय! आकासबानी में होय! फिल्मन में होयौ करै। पीछै ते अबाज आवै, वोई तौ?

—हां, ठीक! ये फ़िल्में दिल्ली में हिन्दी भाषा के स्वरूप को लेकर बन रही हैं। चचा, दिल्ली अकेला ऐसा शहर है, जहां भारतवर्ष की सारी भाषाएं बोली जाती हैं और वे सारी भाषाएं अपने साथ अपनी संस्कृति लेकर आती हैं। दिल्ली में उन संस्कृतियों का मिलन होता है। दृश्य देखकर मैंने अपनी आवाज़ में माधुर्य लाते हुए कहा,चिलचिलाती धूप से छांव तक, गांव से नगर और नगर से गांव तक, तरह-तरह के वाहनों पर चढ़ते और उतरते हैं पांव, मनुष्य के पांव। फिर सवाल उठा, भाषा का वाहन क्या है? और जवाब मिला, भाषा का वाहन है मनुष्य की संस्कृति। चचा! चूंकि इतनी सारी भाषाएं दिल्ली में बोली जाती हैं, तो दिल्ली भारत की संस्कृतियों का एक तरह से संगम है। फ़िल्म में भाषा-विशेषज्ञ के तौर पर डॉ. विमलेश कांति वर्मा भी बोल रहे थे।

—बे का बोले?

—उन्होंने कहा कि दिल्ली देश का दिल है। दिल्ली से देश संचालित होता है। यहां तरह-तरह के लोग रहते हैं। तमिलभाषी, असमियाभाषी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कश्मीरी। दिल्ली एक ऐसा राजनैतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र बन गया है कि यहां जो कुछ होता है, उसका प्रभाव पूरे देश पर नहीं, पूरे विश्व पर पड़ता है।

—जे बात तौ ठीक कही उन्नैं।

—फिर मालिनी अवस्थी कह रही थीं कि मुझे लगता है हिन्दी हमारे देश की ऐसी भाषा है जिसका सबसे ख़ूबसूरत परिचय भारतवर्ष के लोकगीतों में मिलता है। हिन्दी का दिल सारे प्रान्तों के लोकगीतों में धड़कता है। फिर उन्होंने नौटंकी शैली में एक गाना गाया, चचा क्या सुर लगाती हैं!

—कौन सौ गानौ? याद ऐ कछू?

—याद है पूछकर, आपने याद दिला दिया, क्योंकि भूलने वाले से शुरू होता है वह गाना। बहरेतबील है, ‘भूलने वाले से कोई कह दे ज़रा, इस तरह याद आने से क्या फ़ायदा, जब मेरे दिल की दुनिया बसाते नहीं, फिर ख़यालों में आने से क्या फ़ायदा।’

—भइया! हिन्दी में जा गाने की का तुक भई?

—एक नमूना दिखाया था कि हिन्दी भाषा का जो तेवर है, वह मानक हिन्दी का नहीं है। उसमें उर्दू के शब्द भी आते हैं। कुल मिलाकर यह बोल-चाल की भाषा है। इन फ़िल्मों से यह सन्देश  निकल कर आ रहा था कि अलग-अलग भाषा-भाषी जब मिलते हैं तो एक निराली ही दुनिया हो जाती है। भाषाएं एक-दूसरे में मिलने लगती हैं। हिन्दी में उर्दू, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेज़ी, सब मिल जाती हैं, और ये जो मिश्रण होता है, उसका अपना ही स्वाद, अपनी ही सुगंध होती है। हिमांशु जोशी कह रहे थे कि हिन्दी का स्वरूप बड़ा वैविध्यपूर्ण है, बड़ा विचित्र है। जितनी अधिक भाषाओं का स्वरूप इसमें समाहित है, उतनी शायद दुनिया की कम भाषाओं में हैं। एक मुद्दा हिन्दी-उर्दू  लेकर उठा।

—मुद्दा उठाइबे वारेन की भली चलाई!

—विमलेश कांति वर्मा कह रहे थे कि भाषा-विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दी-उर्दू एक ही हैं, अन्तर सिर्फ़ लिपियों में है। लेकिन चचा, ऐसा कहने से बहुत सेलोग बुरा मान सकते हैं। सभी भाषाओं का अपना अस्तित्व है। लिपियों के बारे में विमलेश जी ने उदाहरण दिया, लिपि तो वेशभूषा हैं। हम पेंट और शर्ट पहनकर अंग्रेज़ नहीं बन जाते और अंग्रेज़ कुर्ता-पायजामा पहनकर भारतीय नहीं बन जाते। हिन्दी और उर्दू उनके अनुसार, लोग कुछ भी कहें, एक ही हैं। उन्होंने अपनी बातका समाहार अच्छा किया, वे बोले कि गांधीजी जिस हिन्दुस्तानी भाषा की परिकल्पना करते थे, वह यही है। इसमें हिन्दी और उर्दू मिली हुई हैं। हिन्दी न पंडितों की भाषा है, न मौलवियों की। यह जन-साधारण की भाषा है और जो भाषा जन-साधारण की होती है, शक्ति उसी में होती है। विद्वानों की भाषा में शक्ति नहीं होती।

—कोई सुद्धताबादी इन बातन्नैं नायं मानैगौ रे!

—हम तो प्रबुद्धतावादी हैं चचा। भारत की हिंदी दरअसल हिन्दुस्तानी है। इसमें संस्कृत का छौंक लगाकर हिंदी वाले इसे हिंदी कह लें और अरबी-फ़ारसी का तड़कालगाकर उर्दू वाले उर्दू। शुद्ध हिन्दी और ख़ालिस उर्दू आमजन की भाषाएं नहीं हैं।

 


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