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    विचित्र किंतु सत्य स्थितियां

    —चौं रे चम्पू! कहां ते आय रह्यौ ऐ?

    —मैं ऑडिटर साहब से मिलकर आ रहा हूं।

    —अरे तेरौ काम तौ एडीटरन ते परै, औडीटरन ते का गरज आन परी?

    —चचा, क्या बताऊं? सरकारी अनुदानों से चलने वाली शैक्षिक संस्थाओं की ऐसी विचित्र किंतु सत्य क़िस्म की स्थितियां होती हैं। जिनका लेखा न किसी लेखाधिकारी के पास है न किसी देखाधिकारी के पास। क्योंकि, किसी ने देखा ही नहीं कि क्या हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ, किसने किया?

    —भयौ का? जे तौ बता!

    —मामला ये है चचा कि हर साल संस्थाओं के बही-खातों का ऑडिट होता है। ऑडिटर सारी फाइलें देखते हैं। काबिल से काबिल के सामने बिल से बिल मिलाते हैं। कुछ लोग अतिरिक्त काबिल होने के बावजूद बता नहीं पाते हैं कि स्थान सामान-रिक्त क्यों है? स्टॉक रजिस्टर पूरा क्यों नहीं है? कितना सामान आया? कब ख़रीदा गया? कहां रखा गया? किसके पजैशन में है? ज़िम्मेदारी किसकी बनती है? तो आलम ये है संस्थाओं का कि बिल बताते हैं कि सौ कूलर खरीदे गए, लेकिन काबिल नज़रें देखती हैं कि वहां दस भी नहीं हैं, और जो दस हैं उनके अन्दर से पंखा ग़ायब है। मैंने पूछा, भैया कहां गए कूलर, कहां गए पंखे? इसका निदान क्या है? आपको हंसी आएगी सुनकर कि क्या निदान बताया गया।

    —का निदान बतायौ?

    —निदान ये बताया कि साहब एसी लगवा दो। उनको कोई निकाल नहीं सकता। है न मज़ेदार निदान! पर मामला सिर्फ़ कूलर का ही नहीं है। सर्दियों में हीटर ग़ायब। टंकी, फर्नीचर ग़ायब। मेज़ से पैन-पेपरवेट ग़ायब। बोन चायना के टी-सैट ग़ायब। रॉड ग़ायब, बल्ब ग़ायब। नलों से टोंटी ग़ायब। स्टोर से लोहे-लकड़ी का कबाड़ ग़ायब। जहां शिक्षित वर्ग अधिक आए, वहां से सन्दर्भ-ग्रंथ ग़ायब। अल्मारी खुली रह जाए तो छुट्टी बचाने के चक्कर में हाजिरी का रजिस्टर ग़ायब। स्टॉक-वैरिफ़िकेशन के डर से स्टॉक रजिस्टर ग़ायब। अब धीरे-धीरे हुआ ये कि ऑडिटर हर साल आते हैं और अपनी टिप्पणी लिख कर चले जाते हैं कि हिसाब देख लिया गया है लेकिन स्टॉक रजिस्टर नहीं दिखाया गया और अनेक वर्ष से फिजिकल वैरीफिकेशन नहीं हुआ है।

    —जे फिजीकल वैरीफिकेसन का ऐ रे?

    —मतलब ये कि रजिस्टर में दर्ज सम्पत्ति का आंखों से देख कर मिलान किया जाए। अब सालों पुराने स्टॉक को कोई कहां खोजे! वह सामान काल-कवलित हुआ या कुछ घरों की शोभा बढ़ा रहा है, कौन जाने! संस्थाओं की अनेक शाखाएं हैं। उन शाखाओं की प्रशाखाएं हैं। हर शाख पर कौन कौन सा लल्लू बैठा है, इसका पता लगाओ। जिस शाख पर बैठे थे उसी को काट कर किस-किस ने अपनी लकड़ी की टाल बना ली। सबसे अच्छा तरीक़ा है कि टाल जाओ या अपनी ज़िम्मेदारी दूसरे के कन्धे पर धर दो।

    —जिम्मेदारी तौ वाकी ऐ जानैं चारज लियौ?

    —इंचार्ज कौन से प्रशासनिक अफ़सर हैं, अध्यापक हैं बिचारे। स्थानांतरित होते रहते हैं। एक हस्ताक्षर में हस्तांतरण सम्पन्न हो जाता है। नया-नया गया। उसे क्या पता कि वहां से क्या-क्या गया? क्या उसने वहां की चल-अचल सम्पत्ति का लेखा-जोखा देखा? मिलान किया। नहीं किया। पढ़ाने-लिखाने वाला व्यक्ति है, सौंप दिया गया प्रशासन। खाने वाले खा गए मलाई, कुसूर इसका कि रिपोर्ट नहीं लिखाई। दूसरे खा गए दही, मारा जाएगा यही। मैं नहीं समझता कि अगले पन्द्रह-बीस साल तक भी स्टॉक रजिस्टर मिलेंगे और फिजिकल वैरीफिकेशन किसी भी संस्थान का हो पाएगा।

    —तू चौं अपनौ दिमाग़ खपावै! चार चौधरी बैठार दै। वो मिलिकै सब निकार लिंगे! और नायं निकार पामैं तौ उन लोगन कूं निकार दिंगे जो रजस्टर नायं निकार पाए।

    —चचा, सलाह आपकी बिलकुल दुरुस्त है, लेकिन बड़ा मुश्किल काम है रजिस्टर निकालना, दोषी बशर निकालना, सूखे-प्यासे खेतों के लिए नहर निकालना और मरने के लिए ज़हर निकालना। अपने अन्दर से एक लहर निकाली थी कि चलो ठीक करते हैं, लेकिन व्यवस्था में तार इतने टूट-फूट गए हैं कि न तो दिल से दिल जुड़ा है और न दिमाग़ से दिमाग़। अगर जुड़ा है तो स्वार्थ। जुड़ा है तो अपना हित। अपनी दुकान, अपना मकान। काहे की संस्था, काहे का संस्थान?

     


     

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