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  • वेदना में नहीं संवेदना में कमी

    20110214 Vedana mein nahi sanvedana mein kamiकम एज ज़्यादा एजूकेशन

    बेरोज़गारी से जूझता ये नेशन।

    युवाओं के जत्थे का जत्था

    रेल जैसे मधुमक्खी का छत्ता!

    सभी चाहते हैं कि उनके बच्चे,

    पद पाएं एक से एक ऊंचे

    एक से एक अच्छे।

     

    पुलिस या सुरक्षा बल में

    क़ायदे-कानून के अमल में

    योगदान देने

    रोजगार लेने

    चार सौ रिक्तियों के लिए

    चार लाख नौजवान आते हैं।

    जलती बसें और फुंकती रेलें देखकर

    बिना किसी मदद के

    मालगाड़ी पर लद के

    दल के दल कभी पैदल

    घर आ जाते हैं।

    आए तो आए,

    नहीं आए तो नहीं भी आए।

    कहां गए

    मां-बाप को कौन बताए!

     

    ओ इंजन ड्राइवर

    अगर तेरे अपने बच्चे

    रेल की छत पर

    सफ़र कर रहे होते

    तो क्या तू फ्लाईओवर

    या बिजली के तार आने पर

    ब्रेक नहीं लगाता?

    गाड़ी दौड़ाए चला जाता?

    छत पर कितना हुजूम था,

    दुष्ट, तुझे मालूम था!

     

    हालात को देखकर आंखों में नमी है,

     

    बात ये नहीं है कि वेदना बढ़ी है

    बात ये है कि संवेदना में कमी है।

    wonderful comments!

    1. Dr Kamal जून 15, 2011 at 5:37 अपराह्न

      Dear sri Ashokji Very true! We over look an injured person on road A crying child a hungry mother Wish we could change!

    2. sunita patidar जुलाई 14, 2011 at 5:30 अपराह्न

      in our cuntry many people not reched in job . because papulation problem .

    3. shobha मार्च 19, 2012 at 1:35 अपराह्न

      sahi baat kahi, samvednaye sirf apne khas logo ke liye reh gayi hai....

    4. Vinod Nagpure मार्च 29, 2012 at 7:00 पूर्वाह्न

      Bilkul sahi hai Ashokji! Kya iski wajah ye hain ki humari jivan drishti ab adhyatmik na rahkar bhogwadi ho chali hai (ya ho chuki hain!). Ye sawal barabar pareshan karta rahta hain ki aisa kyon hain? Kyon ho raha hain?

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