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वे फूंक-फूंक ये फांक-फांक

वे फूंकफूंक ये फांकफांक

 

—चौं रे चम्पू! राजनीती में जे कैसौ दौर आयौ ऐ रे?

—चचा, ये दौर है स्वच्छता और सावधानी का। स्वच्छता घटी तो जनता नटी, सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी। बड़ी-बड़ी पार्टियां को ’आप’ की थाप भारी पड़ गई। जो हार गए, वे फूंक-फूंक कर कदम रखेंगे, जो जीत गए, वे फांक-फांक कर।

—का फांक कै कदम रक्खिंगे?

—सत्ता की पंजीरी। पंजीरी फांकना मुश्किल होता है। मलाई आसानी से चाटी जा सकती है। पंजीरी गले में फंस सकती है। किसी को पंजीरी फांक कर गाली दो, फूफा ही कह दो, सामने वाले के मुंह का मेकअप हो जाएगा। वह बिर्र हो सकता है।पहली बार पंजीरी-प्रसाद मिला है तो सावधानी बरतनी होगी। वादे किये हैं तो स्वच्छ इरादे दिखाने होंगे। लेकिन…

—कैसी लेकिन?

—देखिए शासन बदला है, प्रशासन-व्यवस्था वही है। इसको बदलना आसान है क्या? दिल्ली में दो हज़ार तीन सौ बेलदारों पर गाज गिरी, बूटेदारों का बिगाड़ कर दिखाओ। हालांकि, ये माना जाएगा कि ’आप’ पार्टी ने जनता के मन में ये उम्मीदजगाई है कि सब कुछ बदला जा सकता है। यह भी दिख गया कि खुंदक खाई भावुक जनता अगर ठान ले तो कोई शासन स्थायी नहीं रहता। लेकिन प्रशासन?

—जनता कूं प्रसासन कौ का इल्म?

—हां, नहीं होता! नियम-कायदों का इल्म नहीं होता। जनता बिना सोचे-समझे मान बैठती है कि वायदे पूरे हो जाएंगे, वह प्रशासन को नहीं जानती जो काजल की कोठरी है। जनता की ताकत से प्रशासन में भी परिवर्तन होना चाहिए। नियमोंकी ओट में भ्रष्ट आचरण वहीं पनपता है। अधिकारी पल में पाला बदल लेते हैं। वे जानते हैं कि अपने मंत्री को कैसे खुश रखना है। उन्हें इससे मतलब नहीं होता कि मंत्री किस पार्टी का है। वे मंत्री के सामने इतने झुक जाते हैं कि अंततःमंत्री ही उनके आगे झुक जाता है। तरह-तरह से डराते हैं, ख़तरे बताते हैं। वे मंत्री की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पहचानते हैं। उसकी सुविधाओं में कोई कटौती न हो इसका ध्यान रखते हैं। ‘आप’ पार्टी के नेताओं ने कह दिया, गाड़ी मेंनहीं बैठेंगे, बत्ती नहीं लगाएंगे, सुरक्षा नहीं लेंगे, सरकारी बड़ा बंगला नहीं चाहेंगे, सादगी से समारोह करेंगे, अच्छी बात है। पर सादगी महंगी पड़ रही है। वे आम आदमी बने रहना चाहते हैं, लेकिन जीत ने उन्हें ख़ास आदमी बना दिया है।धीरे-धीरे सुविधाएं स्वीकार कर लेना उनकी मजबूरी बनता जाएगा। प्रशासन ने उन्हें बता दिया कि अब वे ख़ास हो चुके हैं।

—आम आदमी और खास आदमी में का फरक ऐ लल्ला?

—आपका ये सवाल अब पेचीदा हो चला है चचा! पहले धारणा रहती थी कि आम आदमी ग़रीब होता है और ख़ास आदमी अमीर। आम आदमी को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। उसके जीवन में उमंग-उल्लास, वैभव-विलास औरआमोद-प्रमोद की सामग्रियां नहीं होतीं। वह मेहनतकश होता है, किसान होता है। रोज़ कुआं खोदता है और पसीना बहाता है। दानों और अनुदानों पर आश्रित रहता है। ख़ास आदमी के पास सब कुछ ज़रूरत से ज़्यादा होता है। पिछले एक दशकमें जिस तरह से चीन का सस्ता माल देश में आया है और अचानक बड़ी-बड़ी मॉल हर चार किलोमीटर के बाद दिखने लगी हैं, उसने भ्रमों की अनेक चादरें हमारे दिमाग़ों पर डाल दी हैं। अचानक चारों तरफ विकास ही विकास नज़र आने लगा है।मुंह में ग्रास जा रहा है या नहीं, इस पर ध्यान नहीं रखा गया। कहा जा रहा है कि देश के वे सब अमीर लोग आम आदमी हैं जो ईमानदारी से ऊपर आए। बताइए चचा, अब विशुद्ध ईमानदारी से कोई अमीर बनता है क्या? वह अगर ईमानदारहै तो हमारे देश के कानून बेईमान हैं, जो ग़रीबी और अमीरी के फ़र्क को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। इस समय का सबसे बड़ा संकट आम आदमी और खास आदमी के बीच की विभाजक रेखा को पहचानना है।

—कैसै पहिचानिंगे रे?

—विचारधाराओं के गड्डमड्ड होने से जो कुहासा छाया है, वह किसी मज़बूत विचारधारा से ही हटेगा। इतना तय है कि बिना स्वच्छ विचारों के किसी स्वच्छ समाज की संरचना नहीं हो सकती। इस घटाटोप में अपराधी अपना रास्ता बड़ी सुगमतासे निकाल लेते हैं और निरपराध बिना बात एक अपराधबोध से ग्रस्त रहते हैं। वे फूंक गए, अब फूंक-फूंक कर क़दम रख रहे हैं। इन्होंने कोस-कोस कर दिल फांक-फांक कर दिया, अब पंजीरी फांक रहे हैं।

 


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