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    वे देते तो मैं लेता भी नहीं

     

    —चौं रे चम्पू! आदमी कूं सलाह की जरूरत कब पड़्यौ करै?

    —जब वह संकट में होता है। हर किसी की सुनता है। उन विषयों पर भी सुनता है, जिन्हें वह अच्छी तरह जानता होता है। वह उन समस्याओं के बारे में भी चर्चाएं करता है जिनके संतोषजनकनिदान वह पहले ही प्रस्तुत कर चुका होता है।

    —समझ में नायं आई तेरी बात।

    —चचा, क्या हुआ कि कल मुझे हल्का सा बुखार आ गया। मौसम की ऐसी मार और एसी का मज़ा, दोनों के कारण मिल गई सज़ा। बुखार के साथ और वमन और प्रवाहिका भी। आप तो जानते हैं कि कोई भी वर्कोहलिक आदमी बीमारी अफोर्ड नहीं कर सकता। सो मैं गया अपने डॉक्टर के पास। डॉक्टर स्वयं मुरझाई कली के समान झुका चेहरा लिए बैठे थे। मैंने पूछा, क्या हुआ डॉक्टर साहब? वे बोले, मौसम ने मार डाला।

    —यानी कै उनैं ऊ लू लग गई!

    —हां चचा! मैंने उनसे भी कहा कि आप ज़रा से लूलू हुए नहीं कि लू लग जाती है।

    —लूलू कौ यहां का मतलब?

    —उन्होंने भी यही पूछा। मैंने कहा लूलू होने से मतलब ये है कि आपने खान-पान का ध्यान नहीं रखा। सड़ैला, पड़ैला, अनडिज़ायर्ड, एक्सपायर्ड, बुसैला, कसैला, यानी विषैला भोजन किया। पसीना निकला, शरीर में पानी की कमी हुई, नमक जाता रहा। अब आपकी शक्ल नमकीन कैसे रह सकती है डॉक्टर साहब! सिर में भारीपन महसूस होता है। नाड़ी की गति तेज़ हो जाती है। शरीर ऐंठने लगता है। तलुओं में तपन होती है। आंखों में जलन होती है। बुख़ार बढ़ जाता है। ये सब अगर ज़्यादा हो जाए, तो जान के लाले पड़ सकते हैं। ऐसे में क्या करो, अच्छे डॉक्टर को दिखाओ, लेकिन जबडॉक्टर ही बीमार हो तो किसे दिखाओ? आप दवाई क्यों नहीं लेते डॉक्टर साहब?

    —फिर का बोले तेरे डागदर साब?

    —बोले, आप आत्मीय हैं इसलिए बता रहा हूं, दरसल, अपनी दवाइयों से डर लगता है। मैंने कहा, हमें खोंच भर-भर के गोलियां थमा देते हैं। कितनी एंटीबायटिक और कहां-कहां कितनी तरह की रोक लगाने वाली गोलियां। उस रोकथाम के तरीके पर रोकथाम क्यों नहीं करते आप? वे बोले, आप ठीक कह रहे हैं। देसी निदान से बढ़िया कुछ नहीं है, पर अगर कोई बीमार मेरी क्लीनिक परआए और मैं उससे कहूं कि भैया आम का पना पी ले, तो वो न तो मुझे फ़ीस देगा और न मुझे डॉक्टर मानेगा। उसे तो तत्काल ठीक होना है। फिर दे देता हूं दवाइयां। ऐसी दवाइयां जो विदेशों में बैनकी जा चुकी हैं, या बेहद संकट आने पर दी जाती हैं। ख़ुद खाने में डर लगता है।

    —कमाल ऐ, दूसरन्नै दै रए ऐं और खुद नायं खा रए।

    —संकट में थे, मेरी सलाह ध्यान से सुन रहे थे। मैंने भी एक मंजे हुए अनुभवी वैद्य की तरह उन्हें बताया, देखिए इस मौसम में लू लगना बहुत सामान्य सी बात है। लू क्या है, गर्म हवा! किसी छायादार स्थान या तालाब के किनारे बैठें, वही हवा आपको ठण्डी लग सकती है। पानी में कपड़े को भिगो कर हवा में रखें तो वह ठण्डा हो जाता है। सिर पर गीले कपड़े की पट्टी लपेटनी चाहिए। बर्फ या फ्रिज का पानी पीने की बजाय घड़े का पानी पिएं और शरीर को गीले तौलिए से पोंछते रहें। अभी आपने कहा था मरीज़ को पना बताएंगे तो आपको डॉक्टर नहीं मानेगा, लेकिन आम-कैरीका पना लू में रामबाण है। गंध झेल सकें तो प्याज़ का प्रबंध करें। बड़ी गुणकारी चीज़ है। प्याज़ का लेप शरीर पर लगा लें। हल्का, शीघ्र पचने वाला भोजन करें। बाहर निकलें तो ख़ाली पेट या बहुत भरे पेट न निकलें। पानी पीते रहें। नर्म, मुलायम सूती कपड़े पहनें। ठंडाई का नियमित सेवन करें।

    —अच्छा लल्ला, तैनैं उनैं जे नायं बताई कै ठंडाई में नैक सी भांग ऊ मिलाय लें।

    —चचा, ये तो तुम्हारी बगीची के सचमुच में लूलू बनाने वाले संस्कार हैं। मैं तो डॉक्टर को नीरोगी करना चाहता था।

    —फिर तैनैं उन्ते कोई दवाई लई का?

    —अरे, मेरी सलाह पर शिष्य की तरह सिर हिलाते रहे। उनकी हिम्मत ही नहीं हुई कोई एलोपैथी की एंटीबायटिक दवाई देने की। ….और वे देते तो मैं लेता भी नहीं चचा, क्योंकि संकट इतनागहरा नहीं था।

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