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वापस बुलाएंगे वे जिन्होंने भेजा ही नहीं

वापस बुलाएंगे वे जिन्होंने भेजा ही नहीं

 

—चौं रे चम्पू! जे वापस बुलाइबै के अधिकार कौ का मतलब ऐ?

—इसे ऐसे समझो जैसे जनता एक कन्या है, उसके सुखी जीवन के लिए संविधानरूपी पिताजी ने अलग-अलग राज्यों से नेतारूपी संभावित दूल्हे मतपेटी के मंच पर खड़े कर दिए। चुनावरूपी स्वयंवर रचाया गया। कन्या से कहा गया कि इनमें से जिसे चाहे चुन ले। चचा!

कन्या ने तो अपनी ओर सेमतपेटी तक आने के लिए टिकिट भेजी नहीं थी। उसे तो उन्हीं में से एक को चुनना था,

जो स्वयंवर के मंच पर अलग-अलग दलों द्वारा खड़े कर दिए गए थे या कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार थे जो आत्म-मुग्धता में कतारबद्ध हो गए थे। संविधान पिताजी की मजबूरी है कि किसी को रोक नहीं सकते।निरक्षरता और ग़रीबी के आभूषण पहनकर मतपेटी के मंच पर बेचारी जनता ठेल-ठेल कर लाई गई। और जैसा अड़ौसियों-पड़ौसियों ने बताया, या जिसके ढोल-नगाड़े ज़्यादा बजे, या जिसने ज़्यादा सुनहरे आश्वासन दिए, या जिसने कपड़ा और बासन दिए,

कन्या ने उसके गले में बटन दबा करमाला डाल दी। चुनाव स्वयंवर सम्पन्न हुआ।

—अब दूल्हा चलौ गयौ संसद-बिधान सभा में! है न!

—हां! चचा! समझने की बात ये भी है कि पारंपरिक स्वयंवर और चुनाव-स्वयंवर में अंतर है। अंतर ये है कि यह विवाह उम्र भर के लिए नहीं है, पांच साल की कॉण्ट्रैक्ट-मैरिज है। प्यार बना रहा तो कॉण्ट्रैक्ट अगले पांच साल के लिए रिन्यू भी हो सकता है।

—सइयां गए परदेस, बदल कै भेस, लगा कै ठेस!

—चचा! निज की ज़िन्दगी की रेस में शामिल हो गए और भूल गए कि गांव में एक बहुरिया भी छोड़ आए हैं। ‘राइट टु रिकॉल, कहता है कि बहू के पास यह अधिकार होना चाहिए कि सइयां अगर मनमानी करे तो जब चाहे उसे वापस बुला ले। तिलक-चन्दन करके भेजने वाली तो वही थी। नेतागण उसी की भलाई का हवाला देकर गए थे। कुछ तो संसद भवन विधान सभा जाकर हवाला में ही लग जाते हैं। कुछ कोरी चर्चाओं में भाग लेते हैं। कुछ पूरे देश की चिंता करते-करते अपनी प्यारी जनता को भूल जाते हैं।

—फिर तौ वापस बुलाइबै कौ अधिकार ऊ होनौ चइऐ।

—चचा, सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि वापस बुला लो। कोई एक नहीं हज़ारों-लाखों वोटररूपी रानियां थीं दूल्हे राजा की। हर किसी की अपनी-अपनी समस्या। जो सचमुच कष्ट में होती है वो तो बेचारी कुछ बोल ही नहीं पाती। रानी की जगह हैरानियां सामने आती हैं।

नाली साफ करने झाड़ूलगाने आएगा क्या वो! वो हजारों-लाखों लोगों द्वारा चुना गया है। एक व्यक्ति से कितनी उम्मीदें की जाएं कि वो सबकी उम्मीदें पूरी करेगा। लेकिन सइयां जी झांके ही नहीं पांच साल तक। ऐसे बांके जवानों का मान-मर्दन करने के लिए ‘राइट टू रिकॉल’ का प्रस्ताव अच्छा लगता है, लेकिन जोलोग वापस बुलाएंगे, वे सच्ची जनता के प्रतिनिधि होंगे क्या? कौन बुलाएंगे! वही जो अपनी पार्टी की इच्छाओं के साथ कुलबुला रहे होंगे। वापस बुलाने का मामला कुल मिलाकर कुलबुलाने का मामला है।

—तौ का भिरस्ट लोगन कूं बरदास्त करें?

—देखिए, अपने कार्यकाल में कोई भी सांसद या विधायक यदि भ्रष्टाचार करता है, अपहरण, बलात्कार में दोषी पाया जाता है, तो कानून उसको तिहाड़ का रास्ता दिखा देता है। लाख जतन करो चचा, राइट टू रिकॉल इस देश में और इस संवैधानिक ढांचे में चल नहीं सकता। होना ये चाहिए किउनको भेजने से पहले ठोक बजाकर देखें कि जिसको हम भेज रहे हैं, वह कौन सी भजनमण्डली का है! किसी पार्टी से टिकिट मिल गया,

इतना ही पर्याप्त है या जनता की सहमति भी आवश्यक है। मुझे तो चुनाव आयोग की वह बात कुछ जमी।

—कौन सी बात?

—’राइट टु रिकॉल’ की जगह ‘राइट टु रिजैक्ट’ की सुविधा होनी चाहिए। कन्या को कोई भी प्रत्याशी वरयोग्य न लगे तो वह सबको अस्वीकार करने के अधिकार का इस्तेमाल करे। यानी न पहनाए वरण की माला! ‘राइट टु रिकॉल’ में चचा वही सक्रिय होगा जिसने माला डाली ही नहीं होगी। वापस बुलाएंगे वे जिन्होंने भेजा ही नहीं होगा।

 


 


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