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तुम्हें चाहिए सेवाव्रती दासी

tumhen chaahiye sovaavratee daasee

 

 

 

 

 

 

 

तुम्हें चाहिए सेवाव्रती दासी

(नारी की पीड़ाएं सुननी ही होंगी)

 

 

तुम्हारे सामने हूं,

सामना करती हुई मैं हूं,

तुम्हें सद्बुद्धि आए,

कामना करती हुई मैं हूं!

 

तुम्हारी चाकरी में,

नींद पूरी भी न सोई मैं,

सवेरे द्वार तक

आंगन बुहारा

फिर रसोई में,

लगी,

बच्चे पठाए पाठशाला

फिर टिफ़िन-सज्जा,

गई ख़ुद काम पर

आई नहीं तुमको तनिक लज्जा,

कि लौटी तो तुम्हें फिर चाहिए

सेवाव्रती दासी,

तुम्हें क्या बोध

जीवन शोध

भूखी है कि वो प्यासी!

किया है काम मैंने भी

लगी मैं भी रही दिनभर

वो घर की देहरी हो,

या कि हो

दूरस्थ का दफ्तर।

कहीं मैं डॉक्टर हूं

तो कहीं करती वकालत हूं,

कहीं अध्यापिका या जज बनी

देती हिदायत हूं।

कहीं मैं सांसद हूं,

कहीं पर प्रतिभा परखती हूं,

मैं घर के बुज़ुर्गों का,

बालकों का ध्यान रखती हूं।

 

नहीं क्यों तुम मुझे

मेरा प्रतीक्षित मान देते हो,

कृपाएं ही लुटाते हो,

फ़कत अनुदान देते हो!

 


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