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  • तू अपराधात्मक मैं राधात्मक
  • तू अपराधात्मक मैं राधात्मक

     

    —चौं रे चम्पू! जि बता कै आजकल्ल बो पुलस वारौ किसन-भक्त राधा पांडा कहां ऐ और का कर्रह्यौ ऐ?

    —चचा, वह कृष्ण-भक्त तो स्वयं को राधा मानते हैं। और आप मुझसे ऐसे पूछ रहे हैं जैसे आप धृतराष्ट्र हों और मैं संजय, जो आपको दिव्य-दृष्टि से राधा पांडा केवर्तमान का आंखों देखा हाल सुना देगा! कहां है? क्या कर रहा है?

    —अरे, कल्पना ते बता! कैसौ कबी ऐ? दिब्य सरूप कौ बरनन कर! आंखिन्नै बन्द करकै देख, पांडा दिखाई दै जाएगौ तोय।

    —ठीक है चचा, आंख बन्द करता हूं। हां, दिख गए। वे गोपियों के बीच नृत्य की तैयारी कर रहे हैं। कुछ बोल भी रहे हैं।

    —का बोलि रए ऐं?

    —वे कह रहे हैं, मैंने पुलिस में देखा कि सब कुछ अपराधात्मक होता जा रहा है, बलात्कार रुक नहीं रहे, घोटाले थम नहीं रहे, नेता अपराधात्मक हो रहे हैं, पूरा समाज व्यथित है, जिन लोगों को जेल में होना चाहिए, वे लोग खुलेआम अपराधात्मक हैं तो मैंने सोचा कि जो जेल में प्रकट हुए, उन्हीं की शरण में जाकर राधात्मक हो जाऊं। अपराधात्मक दुनिया का नकलीपन देख कर मैं असली राधात्मक हो गया। तू अपराधात्मक मैं राधात्मक! बस चचा! अब नहीं दिख रहे।

    —देख, देख! ध्यान लगाय कै देख! दिखिंगे! आंखिन्नै मती खोलियो! दिखे?

    —हां, हां, अब दिख रहे हैं चचा। वे कह रहे हैं कि मैंने दुनिया से प्रेमपूर्वक लड़ने के लिए, राधा जी को माध्यम बनाया है, क्योंकि सबसे बड़ी है प्रेम की भाषा, पर कोई मेरी भाषा नहीं समझता, न अरबी, न फ़ारसी, न अंग्रेजी, न हिन्दी। इसीलिए मैंने माथे पर लगा ली बिन्दी। जब मैंने देखा कि जो मुझे दी गई थी, काम में नहीं आ रही है, यानी, पुलिस की स्टिक, तो मैंने अधरों पर लगा ली लिपिस्टिक। ओहो, चचा, अब दृश्य थोड़ा धुंधला हो गया।

    —अरे, लल्ला! आंख चौं खोल्लईं? बंद कर! बे फिरकित्ती दिखिंगे।

    —हां, हां, हां, दिखे! आंख बंद करते ही फिर से दिखे। वे बोल रहे हैं कि मैं पुलिस में आई.जी. रहा। रहा नहीं, रही। नहीं नहीं, रहा। नहीं नहीं, रही। अरे चचा, कभी रहा बोलते हैं, कभी रही बोलते हैं।

    —जो बोलैं आंख बंद कर्कै सुन्तौ जा।

    —अब कह रहे हैं, पुलिस में रही आई.जी. बन कर। और जब मुझे लगा कि मेरा कान्हा मुझे बुला रहा है, मेरा नटवर नागर मुझे बुला रहा है, मेरा मुरलीवाला मुझे बुला रहा है, तो मैंने कहा, आई जी! आई जी!! राधा बन कर आपकी शरण में आई जी!!! अरे चचा, ये तो अब नाचने भी लगे। अब नाच कैसे दिखाऊं?

    —गाय नायं रहे का?

    —रुको! ध्यान से सुनता हूं। हां, कुछ गा रहे हैं। पग घुंघरू बांध पांडा नाची रे। लोग कहें नर, मैं कहूं नारी, डॉक्टरों ने भी जांची रे। पग घुंघरू बांध पांडा नाची रे।

    —आगै बोल!

    —वे कह रहे हैं, सामने मेरे दुनिया झूठी, केवल मैं ही सांची रे।

    —जे तो ठीक ऐ लल्ला! अपराधात्मक समाज ते राधात्मक पांडा सही कहि रह्यौ ऐ।

    —अब वे कहते हैं, भारत वालो मुझे समझ लो, नहीं तो, चली जाऊं मैं करांची रे।

    —जे तो भौत गल्त बात कही! चलौ, कहूं जायं, प्रेम तत्त कौ प्रचार होयगौ लल्ला! पग घुंघरू बांधि कै अगर कछू कह्यौ जाय तौ बड़ौ नीकौ लागै, पर ऐसी बिगरी भईछबी मैं नायं। बैसै उनैं दिमागी दबाखाने मै हौनौं चइयै।

    —अरे, वे कह रहे हैं, पागल हूं पर, जाउं न आगरा, और न बरेली, रांची रे! एफ.आई.आर. झोंक फायर में, प्रेम की पोथी बांची रे।

    —वा भई वा!

    —अरे सुनो चचा! इस बार तो कमाल कर दिया, कहते हैं, राम हैं ताऊ, कृष्ण हैं चाचा, मैं तुम सबकी चाची रे! पंडा के प्रभु, डंडा झूठा, प्रेम मुरलिया सांची रे। पग घुंघरू बांध पांडा नाची रे।

    —वाह पट्ठे! तौ चाची कूं हमाई नमस्ते कहि दै और किसन-जनम की बधाई दै दै। आंखिन्नै खोल्लै! नाचन्दै उनैं। कान्हा के इसारे पै दुनिया नाचि रई ऐ तौ उन्नैऊं नाचन्दै!

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