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टहलते हुए चले जाते कहलगांव

टहलते हुए चले जाते कहलगांव

 

—चौं रे चम्पू! जे कमर चौं थामें भयै ऐ रे! का है गयौ तेरी कमर में?

—चचा, इस कमरतोड़ महंगाई में थोड़ा सा पैसा कमाने के लिए एक कविसम्मेलन करने निकले थे। कमर सचमुच टूट गई।

—का भयौ?

—जाना था कहलगांव, भागलपुर के पास। एनटीपीसी का एक कार्यक्रम था। सुबह साढ़े सात बजे पटना पहुंच गए। एअरपोर्ट से एक गाड़ी आदरपूर्वक गेस्टहाउस ले गई। अगली फ्लाइट से गीतकार सरिता शर्मा और एक हास्यकवि खिचड़ी जी को आना था। खिचड़ी जी का नाम तो सुना था पर दर्शन कभी हुए नहीं थे। सोचा आज देखते हैं।

—अरे लल्ला जे कवि लोग ऐसे नाम चौं धरौ करैं?

—जल्दी प्रसिद्ध हो जाते हैं। अक्खड़, फक्कड़, भुक्खड़, मुच्छड़, अड़ियल, सड़ियल, खटमल, हलचल, पागल, घायल, चंचल, डंठल, मच्छर, खच्चर, शनीचर, फटीचर, हुक्का, फुक्का, धमाका, पटाखा, चमचा, चीमटा, लहरी, गिलहरी, लोमड़ी, खोपड़ी, बड़े-बड़े विचित्र नाम होते हैं। साढ़े नौ बजे के लगभग किसी ने मेरा द्वार खोला तो एक दिव्य व्यक्तित्व दिखाई दिया। कार्ल मार्क्स जैसी दाढ़ी। सफेद बिखरे हुई बाल। गौर वर्ण। पता नहीं कौन हैं, मैंने बड़े आदर से उन्हें अन्दर बुलाया, लेकिन आते ही उन्होंने मुझे आदेश देते हुए कहा कि पलंग पर बैठ जाइए। मैं आज्ञाकारी बालक के समान पलंग पर बैठ गया। वे महाराज तो एकदम साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में मेरे चरणों में लेट गए। मैंने कहा, अरे क्यों लज्जित कर रहे हैं! उठिए! ख़ैर, उन्होंने बताया कि बाइस साल से वे मेरे एकलव्य के समान शिष्य हैं और मुझे द्रोणाचार्य की तरह पूजते हैं। मैंने पूछा, अगर आप बाईस साल पुराने मेरे शिष्य हैं तो अब तक मिले क्यों नहीं।

—तू अंगूठा न मांग लेय, डर के मारै न मिल्यौ होयगौ!

—आजकल के अधिकांश शिष्य अंगूठा दिखाने वाले होते हैं। खैर, मैंने कहा कि आपकी कविता सुनूं तो कोई राय बना सकता हूं। तभी सरिता ने कहा आलू के परांठे तैयार हैं, खाते हैं और निकलते हैं, क्योंकि आयोजक चाहते हैं कि लंच हम वहीं जाकर करें। चार-पांच घंटे का रास्ता है। परांठे जम कर खा लिए। साढ़े चार घंटे तो कहने की बातें हैं, छः घंटे से कम नहीं लगेंगे और चचा आपको हैरानी होगी यह जान के कि हम कब पहुंचे!

—बता कब पहुंचे?

—हम पहुंचे बारह घंटे के बाद। इससे तो टहलते हुए चले जाते कहलगांव। सड़कें चौड़ी नहीं थी, गड्डे बहुत चौड़े थे, बरसात का मौसम। साढ़े चार घंटे तो पटना शहर की परिधि से निकलने में ही लग गए। रास्ते में कहीं कोई ट्रक जैसे रात में दारू पीकर औंधा पड़ गया हो। कहीं रास्ते में पत्थर, कहीं किसी ट्रक से मैदा के बोरे गिर पड़े जो भीग-भीग कर और फूल गए। आस-पास के लोग उन्हें क्यों हटाएं भला! पराई सम्पत्ति को हाथ लगाना भी पाप। पुलिस को क्या पड़ी है कि बोरे हटाए। यहां खिचड़ी जी का कौशल काम में आया। रास्ते के पत्थर-बोरे हटे और सरिता शर्मा की मधुर बातचीत से बोरियत घटी। सुबह दस बजे के चले चचा, हम रात के दस बजे ही पहुंच पाए। कविसम्मेलन का समय सात बजे का था पर बड़े धैर्यशील होते हैं कविसम्मेलन मुशायरे के श्रोता। पलक-पांवड़े बिछाए बैठे थे। हम लोगों ने अपने चेहरे दुरुस्त किए और टूटे-फूटे शरीर लेकर दस मिनिट मं मंच पर पहुंच गए। मंच और माइक में पता नहीं कौन सी ऐसी अद्भुत क्षमता होती है कि अपार ऊर्जा आ जाती है। मैं तो इतना थका था क्या बताऊं! उस पर पुरस्कार यह कि माइक मेरे मुंह के आगे रख दिया गया कि संचालन करिए। उसके लिए भी ताक़त जुटाई। शब्द बिचारे सहयोगी होते हैं, झटपट-झटपट मेरे पास आते रहे। धुंआधार बारिश के बावजूद कविसम्मेलन जम गया। सोचिए,किन-किन कष्टों से कवि और शायर मंच तक पहुंचते हैं।

—लोग समझैं कै फोकट कौ पइसा लै गए।

—चचा, ये जो पैसा मिलता है, कविता के लिए नहीं है। कविता का तो जो पैसा ले वह अधम। यह पैसा उसके उस श्रम और कौशल के लिए मिलता है जो वहां पहुंचने और प्रस्तुति देने के दौरान अपने आपको स्वस्थ रखने में इस्तेमाल किया जाता है।


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2 Comments

  1. prabhu.. mein aapke har post ko par kar dhanya ho jata hu.. kash mein aapke charno ki dhul hota, kash mein aapke kandho par rakhi shawl hota, kash mein aapke hato mein mike hota, kash mein aapke hato ki kalam hota, kash mein aapka beta, aapka koi rishtedar hota, lekin jab bhi aapko sunta hu dekhta hu. na jane aisa kyo lagta hai ki kai janmo se janta hu.. aur yakin maniye mein satya keh raha hu.. bachpan se aapko hi maine apna adarsh mana hai.. chache mujhe apke sanchalan mein kabhi kavita path ka mauka mile ya nahi.. lekin aapke kuch shabd,.. aur ashish pakar hi mein dhanya ho jata hu……..shat shat naman prabhu.

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