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सिडनी मोबाइल गाथा

—चौं रे चम्पू! सिडनी पहौंचतेई फोन चौं नायं मिलायौ?

—कैसे मिलाता? मेरा आईफ़ोन एयरपोर्ट से घर जाते हुए कहीं गिर गया था। कहां-कहां नहीं ढूंढा! ‘लॉस्ट एंड फ़ाउंड’ में फ़ोन करवाया। एप्पल के हर उपकरण में ‘फ़ाइंड माई फ़ोन’ लगाया, पर नहीं पाया। व्यथित-मन रात में अपना फ़ेसबुक पेज खोला तो देखा कि मेरे मैसेंजर पर किन्हीं मार्क साहब का संदेश था, ‘शुभकामनाएं! मुझे सिडनी में एक मोबाइल फ़ोन मिला है, शायद आपको पता हो कि ये किसका है, कृपया मेरे इस ऑस्ट्रेलियन मोबाइल नंबर पर कॉल करें! मार्क।’ अरे चचा, मैंने फ़ौरन चहककर वह नंबर मिलाया। मार्क साहब ने बताया कि उन्होंने वह फ़ोन न्यूटाउन के पुलिस स्टेशन में जमा करा दिया है। मेरे मन में सवाल उठा कि इन्हें कैसे पता चला कि इस फ़ोन का मुझसे कोई संबंध है। इन्होंने तो मेरा फ़ेसबुक पेज भी देख लिया।

—तेरौ फोन खुलौ भयौ होयगो!

—नहीं, लॉक्ड था! ख़ैर, पुलिस स्टेशन पर अपनी आईडी दिखाने के दो मिनिट के अंदर फ़ोन मेरे सामने था। पुलिसकर्मी ने मेरे आगे ही मार्क को फ़ोन मिलाकर बताया कि मोबाइल उसके असली मालिक को दिया जा रहा है। मैं सामान-प्राप्ति का फ़ॉर्म भरने लगा। तभी मेरे मोबाइल पर मार्क का एसएमएस आया, ‘मैं विनम्रता और दृढ़ता से कहना चाहता हूं कि पासकोड नंबर इतना आसान न रखा करें, बदल लें।’ मैं अपना फ़ोन लेकर उस मैत्रीपूर्ण थाने से निकल आया। निकलते ही मार्क को धन्यवादज्ञापन के लिए फोन किया। प्रस्ताव रखा कि कभी साथ बैठकर कॉफ़ी पिएं। उन्होंने बताया कि इन दिनों वे काफ़ी व्यस्त हैं। अब सुनिए कल रात की बात।

—कल्ल का भयौ?

—सर्क्युलर की पर ‘विविड’ नामक प्रदर्शनी लगी थी। ओपेरा हाउस की कोमल-कमनीय और कर्वीय विराट दीवारों पर विराट प्रोजक्शन से चित्रकथाएं चल रही थीं। लोग चलते-चलते देख रहे थे। कुछ सीढ़ियों पर बैठ जाते थे और फिर चल देते थे। मैं अपने पाए हुए फोन से दनादन फ़ोटो खींच रहा था। तभी अनुराग ने कहा, ‘देखिए पापा! कोई अपना आईफोन सीढ़ी पर छोड़ गया। चलिए पुलिस को दे देते हैं, या अभी इंतज़ार करते हैं। थोड़ी देर बाद बदहवास सी, लेकिन हंसती हुई एक लड़की आई। अनुराग ने उसे आईफ़ोन दे दिया। लड़की ने धन्यवाद कहा और वापस दौड़ गई। अब देखिए चचा, न तो मार्क साहब को ऐसा लगा था कि उन्होंने कोई इतना बड़ा काम कर दिया कि कॉफ़ी के हक़दार हो गए, और न इस लड़की ने इतना बड़ा धन्यवाद दिया कि हमने फ़ोन लौटाकर कोई बहुत बड़ा काम कर दिया हो। दरसल ईमानदारी और सहायता तो फ़र्ज़ हैं न!

—हां सो तो हैं लल्ला!

 

 


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  1. ईमानदारी और सहायता तो फर्ज है उसका लाभ सभी को मिलता है।

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