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सूरज को सर्दी लगी

सूरज को सर्दी लगी


—चौं रे चम्पू! बसंत पंचमी है गई, सर्दी जाइबे कौ नाम ई नायं लै रई?

—ऐसी बात तो नहीं है चचा, दिन तो अब गर्म होने लगे हैं। अपनी ये मंकी टोपी उतारिए, देखिए अच्छा लगेगा।

—जे मंकी टोपी नाय़ं, बड़े ढंकी ऐ रे। केजरीवाल के मफलर और टोपी दोऊन कौ काम करै।

—आपको ढंग की लगती होगी, दूसरों को भी तो लगे। मुझे तो इसे देख कर ही गर्मी लग रही है। अच्छा एक बात बताता हूं आपको।

—बता, बता।

—पिछले दिनों भोपाल गया था। ताल के किनारे एक गैस्टहाउस में ठहरा था। कमरे से दिखने वाला नज़ारा दिव्य था। मैंने अपने आईफोन से फोटो खींच लिया। सर्दी केमौसम में सूर्यास्त के समय सूरज निस्तेज सा दिख रहा था। उसके ऊपर संवलाए हुए से कुछ बादल थे। एक बड़ा सा पेड़ था, जो कुम्हलाया हुआ सा दिख रहा था।तालाब नदी जैसा दिख रहा था, जिसमें बुझते हुए सूर्य का बिंब था। पेड़ के फोरग्राउंड में हरी-हरी घास थी।

—असली बात बता।

—चचा, आपमें तसल्ली नहीं है। बता तो रहा हूं। मैंने वह फोटो अपने फेसबुक पेज पर डाल दिया, एक पंक्ति लिखी, ‘सूरज को सर्दी लगी, पेड़ गया कुम्हलाय’, औरमित्रों से अनुरोध किया कि अगली पंक्ति बनाकर दोहा पूरा करें। लगभग सवा लाख चाहकों ने चित्र देखा। पांच हज़ार के क़रीब लोगों ने लाइक किया और तीन हज़ार सेज़्यादा ने दूसरी पंक्ति बनाई। है न सोशल मीडिया का कमाल।

—तीन हज्जार दोहा। इन्ते तौ चार-पांच सतसई बनि जामिंगी।

—प्रतिभा का फैलाव हुआ है। हर कला में श्रीवृद्धि हुई है। दूरसंचार माध्यमों ने कलाओं का जनतंत्रीकरण किया है। ‘वूगी-वूगी’ ने बच्चों को नृत्य सिखाया। ‘नच बलिए’ ने बड़ों को नाचने के लिए प्रोत्साहित किया। ‘अंताक्षरी’ और ‘सारेगामा’ ने गाना सिखाया। मैंने भी ‘वाह-वाह’ नाम का एक धारावाहिक चलाया था, दोहे की एकपंक्ति देता था, दर्शक दूसरी पंक्ति बनाते थे। इस बार फेसबुक पर मित्रों ने एक से एक शानदार पंक्ति बनाई। अनेक दोहों में मात्रादोष था, पर कल्पनाएं ख़ूब दौड़ीं।एक स्पर्धा-प्रस्ताव भी रख दिया कि जो दोहा सबसे अच्छा होगा उसके रचयिता को अपनी एक पुस्तक के पहले संस्करण की दुर्लभ प्रति दूंगा।

—सबते भड़िया दोहा कौन सौ हतौ?

—सबसे बढ़िया तो बाद में बताऊंगा, पहले कुछ अन्य सुन लीजिए। पहली पंक्ति थी, दूसरी पंक्तियां सुनिए, ‘वाह-वाह कहता धनी, निर्धन कहता हाय॥’ सत्यप्रकाशचौरसिया। ‘बीयर की बोतल नहीं, विस्की देउ मंगाय॥’ ‘मेंढक मरे ज़ुकाम से, मछली विक्स लगाय॥’ अनजान। ‘जाय जनवरी भाड़ में, शीघ्र फरवरी आय॥’ स्नेहानार्डेकर। ‘स्पर्धा की आड़ में, तू कविता लिखवाय॥” छवि महरोत्रा। ‘घाट-घाट ख़ाली पड़े, डुबकी कौन लगाय॥ दीप्ति त्रिपाठी। “हाथ अकड़ गए ठंड से, हमसे लिखा नजाय॥’ अजय शर्मा। ‘बाट जोहती है नदी, ऋतु वसंत कब आय॥’ रीता सक्सेना। ‘सैनिक करते चौकसी, लख दुश्मन थर्राय॥’ मार्कंडेय शुक्ला। ’आग लगी है देश में,इसको कौन बचाय॥’ ब्रजेश लोधी। ‘बंगले सीना तानते, झुग्गी जमती जाय॥’ रवि कुलरिया। ‘फूल शाख पर जम गए, कौन इन्हें पिघलाय॥’ श्वेता गौड़। ‘ये घोटाला कौनसा, ईश्वर हमें बचाय’॥ सतीश पांडे। ‘अगर न चेता मनुज तो, धरा नष्ट हो जाय॥’ रामजी विश्वकर्मा। ‘अब प्यारे इस शीत में, गर्म चाय हो जाय॥’ संगीता शुक्लातिवारी। ‘आंखों का पारा गिरा, दृश्य सभी धुंधलाय॥’ प्रशांत वीरेन्द्र श्रीवास्तव। ‘रैनबसेरे कम पड़े, मुख से निकसे हाय॥’ आशीष रावत। धन्य धन्य प्रभु चक्रधर,मूढ़ कवी बन जाय॥’ पंकज जोशी। एक से एक अच्छे दोहे थे, लेकिन तीन हज़ार दोहे देख कर चचा मैंने भी लिख दिया, ‘इतने दोहे देखकर, सिर मेरा चकराय॥’

—तौ ओखरी में सिर दयौ ई चौं? सबते अच्छौ कौन सौ लग्यौ, जे बता!

—ओखली में सिर नहीं दिया, सिर को ओखली बनाया था। एक से एक मूसल पंक्तियां आईं। सबसे अच्छा दोहा था रुचिका खन्ना का, ‘सूरज को सर्दी लगी, पेड़ गयाकुम्हलाय। बदरा बने रज़ाइयां, नदिया हिये लगाय॥’ चचा, छायाचित्र के अनुरूप यह दोहा सर्वश्रेष्ठ लगा। दस में दस नम्बर। बादल सचमुच रज़ाइयां लग रहे थे औरनदी में सूर्य के छिपे हुए से बिंब से वाक़ई लग रहा था मानो उसने सूरज को हृदय से लगा रखा हो।

—सिगरे कबीन कूं मेरी राधे-राधे कहियो।

 


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