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  • सुन मुस्कइहैं लोग सब

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

    सुन मुस्कइहैं लोग सब

    (रहीम दास जो कह गए हैं लोग अभी तक नहीं समझ पाए)

     

    मेरे दिल का दर्द सुनने वाले,

    मन के गोरे न कि काले,

    एक साथी की सख़्त ज़रूरत है,

    अच्छा मौक़ा सही मुहूरत है,

    फार्म भरिए, आवेदन करिए।

     

    उपरोक्त विज्ञापन निकाला मैंने,

    छत पर एक ख़त उतरा बिना डैने।

     

    हम तुम्हें तुमसे ज़्यादा जानते हैं

    और ये मानते हैं

    कि तुम्हारे दर्द अब गोपनीय नहीं हैं,

    तुम समझते हो कि ओपनीय नहीं हैं!

    अरे, सब कुछ तो

    अख़बारों में छप जाता है,

    अगर उन्हीं में

    तुम्हारा सिर खप जाता है

    तो बंद करो सिर का खपाना,

    अगर चाहते हो सुकून पाना,

    तो नया विज्ञापन निकालो—

     

    हे दिल में दर्द रखने वालो!

    विनम्र निवेदन है कि

    मेरे पास आओ,

    कविताएं सुनकर दर्द भगाओ!

    कविमन निज मन की व्यथा

    ज्यों ही ओपन होय,

    सुन मुस्कइहैं लोग सब

    शेअर् न करिहै कोय॥

     

    ये रहीम के दोहे का

    मौलिक रूपांतर है,

    माना कि समयांतर है,

    दोहा बदला इसलिए है कि कहीं

    रहीम दास कॉपीराइट का

    दावा ही न ठोक दें,

    और तुम्हारा

    विज्ञापन ही न रोक दें!!

     

     

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