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स्तम्भ लेखन और बिन-बंधन लेखन

स्तम्भ लेखन और बिन-बंधन लेखन

 

–चौं रे चम्पू! तोय ‘चौं रे चम्पू’ स्थाई स्तम्भ लिखत भए कित्ते बरस है गए रे?

—चार साल पूरे होने वाले हैं चचा।

—स्तम्भ लिखिबे में और बिन-बंधन लिखिबे में का फरक ऐ?

–स्तम्भ लेखन स्तम्भित किए रहता है। सहजता को पी जाता है। जो रचनात्मक साहित्य अपने आप निकलकर आता है, उसकी प्रक्रिया स्तम्भ-लेखन की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न होती है। वैसे ’बिन-बंधन’ आपने अच्छाशब्द-युग्म बनाया। बिन-बंधन-लेखन में हम संवेदनाओं और सजगताओं के आवेगों में स्वतःस्फूर्त लिखने की प्रेरणा पाते हैं। चिंतन-चर्वण के लिए मनवांछित समय लेते हैं। दिमाग़ के हृदय में या हृदय के दिमाग़ में कथ्य को उगाते-पकाते हैं। कागज पर शायद पांच या दस प्रतिशत ही अवतरित हो पाता है, लेकिन एक सुकून होता है, स्थिरता होती है, तसल्ली होती है और स्वछंद आकाश होता है कल्पनाओं का। स्तम्भ-लेखन आकाश को सीमित कर देता है। समय को सीमा में बांध देता है और आपके सामने चुनौती बनकर मुस्कुराता हुआ खड़ा हो जाता है कि दिखा अपना कौशल, कल छपना है।

–तौ कौसल नायं का तोमैं?

–इस लेखन में अभ्यास अधिक काम में आता है, लेकिन इतना स्वीकार करूंगा कि मेरे अन्दर गद्य-लेखन का आत्मविश्वास स्तम्भ-लेखन ने बढ़ाया है। दबाव में भी काम करना होता है।  समसामयिक घटनाएं नज़र में आती हैं। मैं स्वयं को एक भविष्यवादी और आशावादी व्यक्ति मानता हूं, मैं कितना समर्थ गद्यकार या कवि हूं यह तो आगे आने वाला समय और मेरे प्रेमी-अप्रेमी ही बताएंगे, लेकिन इतना जानता हूं कि मुझे सम्प्रेषण के कुछ गुर आ गए हैं।

–सम्प्रेसन!

–हां, बात सामने वाले की समझ में तो आए! इतनी बोझिल न हो जाए कि घट में न उतरे।  इतनी उबाऊ न हो जाए कि चार पंक्ति पढ़ने के बाद पाठक आपके कॉलम का कॉलर छोड़ कर अगले कॉलम का दामन पकड़ लें। गद्य-लेखन मेरे लिए कोई नई बात नहीं है। स्तम्भ-लेखन तो नहीं करता था, लेकिन गद्य लेखन में मेरी गति बहुत प्रारम्भ से रही है। आकाशवाणी के लिए सोलह वर्ष की उम्र से लिखता रहा हूं। आकाशवाणी मथुरा में बच्चों के लिए, किशोरों के लिए नियमित रूप से कार्यक्रम किया करता था, समुद्र तल की सैर, पानी की कहानी, हवा की कहानी, तेल की कहानी, न जाने कितनी ज्ञान-विज्ञानपरक चीजों के लिए मैंने नाटक-रूपक लिखे। बाल उपन्यास लिखता था। ‘मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया’ उन्नीस सौ पिचहत्तर में मैकमिलन ने छापी थी। समीक्षा में भी सम्प्रेषण का ध्यान रखता था। फिल्मों धारावाहिकों के लिए भी निरंतर लिखा है। दूरदर्शन के लिए जाने कितना लिखा है, पटकथाएं बनाई हैं।

—कछू लोग खड़े है कै लिखैं, कछू बैठि कै, कछू लेटि कै, तू कैसै लिखै?

—अर्ध-खड़ित, अर्ध-बैठित, अर्ध-लेटित, कभी इस करवटित कभी उस करवटित, कभी पट्ट कभी चित्त रचित, अनुकूल सिंहासनस्थ शब्द-जटित। मैं एक वाचिक परम्परा का व्यक्ति हूं। अगर मैं कागज और कलम लेकर बैठता हूं तो चार लाइनें लिखने के बाद मैं उनको चार बार पढ़ता हूं और मेरी सोच की प्रक्रिया रुक जाती है। उन चार लाइनों को पढ़ने के बाद मैं आगे के चार पैराग्राफ और सोच चुका होता हूं, लेकिन उन चार लाइनों के पुनर्पाठ के दौरान वे ग़ायब हो जाते हैं। इन दिनों मैं वैसा लेखक नहीं हूं जिसको कहा जाए कि कागज और कलम लेकर घसीटता ही चला जाएगा। मुझे कोई सुधी श्रोता जब तक न मिले, आनन्द नहीं आता। बोले हुए कोडिजिटली रिकॉर्ड कर लेता हूं। फिर टाइप कर या करा लेता हूं।

—तौ… स्तम्भ-लेखन में जादा मज़ा नायं आवै तोय?

—ऐसी बात नहीं है। स्तम्भ लेखन आपको व्यस्त-मस्त रखता है, त्रस्त भी रखता है। मेरी कामना है कि जब तक मैं सदा के लिए धरती के समानांतर न लेट जाऊं और आंखें मुंद न जाएं तब तक स्तम्भ-लेखन करता रहूं। पिछले दिनों विज्ञान भवन में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में लेखन का पुरस्कार नव्वै वर्षीया विजया मुले जी को दिया गया। राष्ट्रपति महोदया ने अपने अभिभाषण में बताया कि मैंने डॉ. मुले से पूछा था कि सर्वश्रेष्ठ लेखन का पुरस्कार आपको मिला है, इस उम्र में भी आप इतना काम कर लेती हैं! डॉ. मुले ने जवाब दिया— ‘अरे! अभी तो मैं सिर्फ नव्वै की हूं।‘ इस पर कैमरे ने सभागार में डॉ. मुले की प्रतिक्रिया दिखाई। वे नौ-वर्षीयाबालिका के समान शर्मा रही थीं।

—तौ हमारौ चम्पू तौ अबी साठ कौ ई भयौ ऐ!

 

 


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  1. बिन-बंधन लेखन सुनने को तो बहुत सुहाता हैं परन्तु मानक स्तम्भ लेखन की पहुँच दूर तक जाती है. आज के समय में जब अपने ही राष्ट्र-भाषा का साथ छोड़ रहे हैं, स्तम्भ लेखन बहुत प्रभावी है.

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