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स्काई-वे से बातचीत

स्काई-वे से बातचीत

-चौं रे चम्पू, जोहानिसबर्ग कौ मौसम कैसो ऐ?

–चचा, वैसे तो ठंडा था, इधर हिन्दी के सम्मलेन ने थोड़ी सी गर्मी ला दी है मौसम में और सैंटन कन्वेंशन सेंटर में समानांतर सत्रों में हिन्दी पर बड़ी चर्चाएँ हुईं, बड़े पर्चे पढ़े गए| पर्चों से संपन्न होकर कोई बाहर निकलकर आता था तो इस फिराक़ में कि हम अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं| पिछले सम्मेलनों से इस सम्मलेन में मैंने ये अंतर देखा कि इतने चित्र शायद किसी सम्मलेन में न खिंचे होंगे जितने इस बार खींचे गए। बहरहाल सुख मिले सबको, फोटो खिंचते रहे और एक-दूसरे को खींचते भी रहे क्योंकि हिन्दी आप जानते ही हैं चचा इस मामले में हथभागी है, शुद्धतावादी क्रुद्ध हो जाते हैं और बुद्धतावादी बुद्ध बनकर सब कुछ देखते रहते हैं, प्रबुद्धतावादी लोगों की संख्या बढ़ रही है, ये खुशी की बात है|

–प्रबुद्धता कैसी?

–प्रबुद्धता इस बात की कि हिन्दी को अब क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ भाषा के तौर पर विकसित करने में कोई लाभ नहीं होगा| नई पीढ़ी तक अगर जाना है तो हम उस तक, बोलचाल की भाषा तक, न भी लाएं, तो भी सरल बनाना होगा|

–तो ऐ अच्छौ लगौ वहाँ जाय कै?

–हाँ चचा, मुझे मुझे अच्छा इस कारण सबसे ज्यादा लगा कि निकष नामक मेरी जो प्रस्तावना है, जिसका गायन मैं पिछले अनेक महीनो से कर रहा हूँ, वह यहाँ पटल पर रखी गई और सबने सराहा कि कैसी दक्षता परीक्षा होनी चाहिए हिन्दी की, जिसमें सुनना, बोलना, लिखना और पढ़ना को जांचा-परखा जा सके और इसके लिए एक प्रमाण-पत्र भी दिया जा सके|

–और का खास बात रही?

–और खास बात ये रही चचा कि जो महनीय साहित्यकार हैं, जो कवि-सम्मलेन को दयनीय समझते हैं, उन्होंने एक षडयंत्र किया| जो कविसम्मेलन 23 तारीख की संध्या को होना था, लेकिन उसे समापन समारोह के बाद रखा गया| अभी तक किसी सम्मलेन में ऐसा नहीं हुआ कि समापन समारोह के बाद कोई और कार्यक्रम हुआ हो| कविसम्मेलन के स्थान पर ओडिशी नृत्य रखा गया| ओडिशी नृत्य भव्य होता है, लेकिन विश्व हिन्दी सम्मलेन की ताकत कविसम्मेलन भी रहा है| मैंने गलियारे में गुपचुप दो महनीयों की चर्चा सुनी| एक महनीय का कहना था, ये गले बाज, चुटकुले बाज राज करेंगे और कविसम्मेलन होगा, हिन्दी की गरिमा की हत्या होगी| कोई सुनने नहीं आएगा| लेकिन काश वे वहाँ होते तो देखते कि सभी सत्रों से कई गुना संख्या कविसम्मेलन में थी| ऐसा लगा ही नहीं कि यह कोई एक बोझिल कार्यक्रम है| साढ़े तीन घंटे तक कविसम्मेलन चला| बीस कवियों ने काव्य पाठ किया|

–और बता और का ख़ास बात रही?

–चचा, यूं तो बहुत सारी बातें रही। उदघाटन सत्र में मुकेश्वर चुनी ने कहा कि मेरा इस सम्मलेन में अचानक ही आना हुआ है, वे भाषा और संस्कृति मंत्री हैं मॉरीशस के। उन्होंने कहा कि कोई लिखित भाषण तत्काल नहीं मिल पाया है, लेकिन मुझे जैसी भी हिन्दी आती है मैं बोलूंगा| और मैं समझता हूँ कि इस सम्मलेन के सबसे अच्छे भाषणों में मुकेश्वर चुनी का भाषण था, जो उन्होंने अपने टूटे-फूटे अंदाज में, लेकिन हृदय से कहा। वसुधैव कुटुम्बकम तभी संभव है जब हिन्दी अपनी ताक़त दिखाए, ऐसा उनका मानना था| चचा, इस भूमि पर जिसके बारे में कहा जाता है कि मोहनदास करमचंद गांधी बनकर गांधी जी यहाँ आए थे और इस भूमि ने उनको महात्मा गांधी बनाकर लौटाया था, अच्छी अनुभूतियाँ हुईं। ये बात दूसरी है कि वर्ग विभेद यहाँ बहुत गहरा है| अमीर, खूब अमीर हैं और गरीब, खूब गरीब हैं| इसीलिए हिंसक घटनाएं होती रहती हैं| सम्मलेन सुरक्षित स्थान पर हुआ, तीनों-चारों होटल उसके इर्द-गिर्द थे| एक होटल से दूसरे होटल में जाने के लिए सड़क के ऊपर स्काई-वे बना हुआ है| उसी स्काई-वे से चलकर मैं आपसे बात करने आया हूँ| बाकी बातें आकर बाद में करता हूँ आपसे|


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  1. bahut sundar chitran. kiya hai prabhu.

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