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शब्दों पर तेज़ाब पड़ गया

शब्दों पर तेज़ाब पड़ गया

—चौं रे चम्पू! कौन सी बात के मलाल में डूबौ भयौ ऐ रे?

—चचा, मलाल का कोई एक छोर नहीं है। जिधर कान जाते हैं, आंख जाती हैं, ध्यान जाता है, ज्ञान जाता है, सिर में मलाल के हज़ारों सिरे मंडराने लगते हैं। किससिरे को पकड़ूं, फिर किस सिरफिरे को पकड़ूं, समझ नहीं पाता। अब तुमने मलाल कहा तो मलाला का मलाल कम है क्या!

—कौन ऐ मलाला?

—अरे, नहीं मालूम आपको? पाकिस्तान की एक पन्द्रह साल की लड़की मलाला यूसुफ़जई, जो लड़कियों के पढ़ने पर पाबन्दी लगाने वाले तालिबानियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही थी। बेदर्दियों ने उसे गोली मार दी। ब्रिटेन में उसका इलाज चला। अब लिखने-पढ़ने की हालत में आई है तो पाकिस्तान के धार्मिक संगठन कह रहेहैं कि यह सब ड्रामा था। अब बताओ मलाल करें कि न करें! उससे ज़्यादा बड़े मलाल की बात अभी कल-परसों की है।

—कल्ल-परसों की बता!

—पन्द्रह साल की ही एक लड़की अपने पिता मोहम्मद ज़फ़र और मां ज़हीन के साथ बाज़ार गई थी। लड़की ने सड़क पर मोटरसाइकिल से जाते हुए एक नौजवान कोदेखभर क्या लिया कि बाप ने वहीं सरेआम उसको डांटा, तेरी मजाल कैसे हुई कि तूने लड़के को देखा। लड़की कांप गई। कहते हैं कि उसने माफ़ी भी मांगी थी किआइंदा ऐसा नहीं करेगी। इस पर और आग-बबूला हो गए खाप का भी बाप ज़फ़र। लिया तेज़ाब और फेंक दिया लड़की पर। लड़की मर गई। कमाल है, गोया लड़कियोंको दंडित करने के लिए हाथ में तेजाब की बोतल लेकर ही घूमा करते हैं। मलाल नहीं होगा चचा, बताओ।

—पाकिस्तान की का चलाई, हमाए देस में का होय नायं।

—अरे चचा, मैंने आपको बताया नहीं, मैं अभी मुम्बई गया था, कौन बनेगा करोड़पति में विशेषज्ञ के रूप में। वहां एक एपिसोड में सोनाली मुखर्जी आई थी। एकसंघर्षरत लड़की। नौ वर्ष पहले तीन मनचले लड़कों ने चेहरे पर तेज़ाब फेंका था। चेहरा विकृत हो गया, नेत्रहीन हो गई, एक कान से सुनाई देना बन्द हो गया। नौसाल तक नेताओं, समाजसेवियों और न्यायकर्मियों के आगे गुहार लगाती रही। कहती रही कि या तो मेरा पुनर्वास और इलाज कराओ या फिर इच्छा-मृत्यु काअधिकार दो। पिता की सारी सम्पत्ति जाती रही। विपत्ति एक के बाद एक आती रही। अपराधी जमानत पर आज भी छुट्टल घूम रहे हैं और धमकाते हैं। मैंने तो जबसुना सोनाली के बारे में तो चार लाइनें लिखीं।

—बता का लिखीं?

—एक हवस की आंधी लावा बनकर लावा बरस गई थी। वाणी कल्याणी मेरी, प्राणों को तरस गई थी। क्या बोलूं कुछ समझ न पाया, मुझे लगा कुछ ऐसा, शब्दों परतेज़ाब पड़ गया, कविता झुलस गई थी। चार लाइन और सुन लो। एक सवाल है हम सबके सामने।

—बता का सवाल ऐ?

—एक उम्र में जब कन्या प्रीतम घर जाना चाहे, प्यारा सा परिवार बसा, सुख से भर जाना चाहे, आज देखकर बिटिया का दुख, एक सवाल उठा है, हम सब ज़िन्दा हैं,सोनाली क्यों मर जाना चाहे!

—वाह भई वाह चम्पू, खूब कही।

—ख़ूब बात वह नहीं है, जो मैंने कही। ख़ूब बात ये है कि सोनाली अब इच्छा-मृत्यु की कामना से ऊपर उठ गई है, क्योंकि लोगों का सहारा मिला, टेलीविजन ने भीसहयोग दिया। अब वह चाहती है पुर्नवास। केबीसी में पूर्व की ब्रह्मांड सुंदरी लारा दत्ता उसके साथ खेली। सोनाली भी कम तेजस्विनी नहीं थी। प्रश्नों के उत्तर देने में एकत्वरित चपलता दिखा रही थी। मैंने सैट पर बैठे-बैठे चार लाइन बनाईं जो वहां सुनाई तो नहीं थीं क्योंकि अमित जी ने बड़े गम्भीर ढंग से एपीसोड का समाहारकिया।

—तू अपनी चार लाइन सुना!

—सांसों से आहें निकलीं पर हिला न कोई पत्ता। जूं तक नहीं कान पर रेंगी, बहरी हो गई सत्ता। चिंता मत करना सोनाली, अब इलाज का ख़र्चा, तुझे जीत कर दिलवादेगी प्यारी लारा दत्ता!  ख़ैर चचा, उसे सहानुभूति नहीं चाहिए, जीने का अधिकार चाहिए, पुनर्वास चाहिए, इलाज चाहिए, मनुष्यता के अधिकार चाहिए और उन लोगोंके लिए धिक्कार चाहिए जो हाथ में तेज़ाब लेकर घूमा करते हैं।

 


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3 Comments

  1. Dear Ashokji..

    shabda par tejab pad gaya.. ye aaena hai .. samaj ka . par aap se ye sikhane milta hai ki aapni aapni vidhame aapne aapne tarikose …. virod karna..

    talvar nahi magar Srugan ki basuri me bhi jwala ke sur milte hai…

    Bachpan se aap ko suna hai… or mere aapne theater group me bhi hamane aap ki kavitao ka path kiya .. aap ka ye blog mere liye prerana ka srot bana hai…
    nahi nahi mai aap ki kavita nahi churata…
    ha bas jaise ped se chaya …
    bujurgonse aashirvad ..
    vaise hi ..kavi ki vani se chingari lena to hum chooton ka huk hai.

    aap ka shabad samarthya hamesha hame prerana deta hai…

    dhanyavad…

    Shrikant Puranik
    Pritha theater Group
    Mumbai.

  2. फांसी होनी चाहिए उनको

    जिन्होंने लोगों को मारा

    फांसी होनी मगर चाहिए

    उनको तो ज़रूर

    जिन्होंने जीते जी लोगों

    को मारा

  3. सांसों से आहें निकलीं पर हिला न कोई पत्ता। जूं तक नहीं कान पर रेंगी, बहरी हो गई सत्ता।! wah
    ashok ji
    nice
    bade hi achche dhang se ek aavaz uthai hai …per
    aaj satta ke bhukhe galiyaro mai koi nahi sunwai hai
    chahe ho wo sonali,ya chahe malala…inke naamo per mat jao
    satta ke bhukho ko vate chahiye, garibo ki kahi nahi hoti sunwai hai………
    ashok jee aapki kafi rachnaye suni hai Rubru bhi or TV program per bhi,,pada bhi aapko
    hamesha aapke vayang rachanaye mujhe bahut Bhati hai..
    aapke blog per pahli baar itifak se aai hun
    per av koshish karugi reguler aau..
    jab bhi office ke kaam se fursat milegi aapko padugi jarur
    thanks

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