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शब्द-निर्माण में छिपी हुई हंसी

शब्द-निर्माण में छिपी हुई हंसी

—चौं रे चम्पू! इत्ती देर कैसै है गई बगीची आइबे में?

—चचा, सोता रह गया। देर से जगा।

—तू तो जगाइबे वारे लोगन में ऐ। सोतौ चौं रह गयौ?

—बिटिया आने वाली थी ऑस्ट्रेलिया से। फ्लाइट आगमन समय था दो बजे का, तीन बजे आई, लेकिन प्रतीक्षा रही सुखदाई, क्योंकि मेरे साथ मेरे छोटे भाई के दो युवा होते हुए बालक थे। रघु बारह का, भानु अठारह का। चचा, दोनों बड़े मस्त हैं। क्या कहने! मेरी तो दिनभर की सारी थकान उन दोनों बच्चों ने मिटा दी। खूब हंसोड़, खूब प्रत्युत्पन्नमति से पूर्ण, खूब रचनात्मक। सबसे बड़ी बात ये कि जब मैं एयरपोर्ट जाने लगा तो दोनों बोले— ताऊजी हम भी चलेंगे। अब बताइए आधी रात को दो बच्चे अपनी दीदी को लेने के लिए, अपने शयन-सुख का त्याग करके ताऊजी के सानिध्य को पाने के लिए निकल पड़े, तो अच्छा लगा। मैं भी बच्चों की तरह उनके साथ किलकता रहा।

—कोई बात बता उनकी।

—अरे चचा! अद्भुत निरीक्षण-क्षमता है दोनों की। छोटा रघु बोला, ताऊजी! दादी के साथ जो लड़की रहती है न ज्योति, वो जब भी कोई संकट की बात होती है न, तो हंसती है। जैसे बिजली चली जाए, पानी टाइम पर नहीं आए, तो हंसेगी। कोई बर्तन टूट जाए तो हंसेगी, हा हा हा, टूट गया! दादी भी नकली गुस्सा दिखा के हंसती हैं। और ताऊजी जितना उससे पूछो न, उससे ज़्यादा बताती है, जैसे उससे पूछो कि ज्योति कंबल कहां है, तो बोलेगी, कंबल वहां नीचे है और कूलर का स्विच ऊपर है।

—हां, देखी ऐ मैंनै! वो लाली ऐसी ई ऐ। तौ एयरपोर्ट पै का भयौ?

—इंतज़ार में हम तीनों एक बेंच पर बैठे थे। सामने से गुज़रता हुआ एक नौजवान मुझे पहचान रहा था। होगा बीस-बाईस का। मुझे देखकर ठिठका और मेरी तरफ आते हुए बोला, आप हिन्दी के पोयमर हैं न? पोयमर! समझ में नहीं आया। वो शायद पोएट कहना चाहता था। मैंने भी भाषाई संकट के समय हंसते हुए कहा, हां हिन्दी का पोयमर हूँ और इन दोनों के कूलर का स्विचर ताऊजी हूं। भानु-रघु ज्योति का स्मरण करके हंसे। नौजवान की कुछ समझ में नहीं आया और चला गया।

—तोय तौ अब ताईं हंसी आय रई ऐ रे!

—पोयमर पर आपको नहीं आई? वैसे उसने गलत क्या कहा! जैसे, पेंट करे पेंटर, डांस करे डांसर, लैक्चर दे लैक्चरर, प्लम्बिंग करे प्लम्बर, रिपोर्ट लिखे रिपोर्टर, वैसे ही पोयम लिखे सो पोयमर। नौजवान का प्रयोग रचनात्मक था। वह भी एक पोयमर था क्योंकि उसने एक नए शब्द का निर्माण किया था। उसके बाद तो जी दोनों बच्चे भी पोयमर हो गए। रघु बोला, फ्लाइट लैंड हो गई है पर दीदी पता नहीं क्यों लेटर हो रही हैं। फिर मोबाइल पर पता लगा कि वो अंदर ड्यूटी फ्री शॉप से मेरे लिए अल्कोहल खरीद रही है। ओहो, अल्कोहलर होने की क्या ज़रूरत थी दीदी को। मैंने कहा, चलो अपने कारकर को फोन मिलाते हैं। अब बड़े वाले भानु बोले, आपका ड्राइवर महाराष्ट्र का है क्या? ऐसे लोग तो महाराष्ट्र में होते हैं कोपीकर, जुनारकर, तेन्दुलकर, वाडेकर। कारकर नहीं, ड्राइवर को कारर कहना चाहिए। कार चलाने वाला कारर।

—ठीक बात! कार चलावै सो कारर! भौत खूब!

—बिटिया बाहर आई। अप्रत्याशित रूप से दोनों छोटे भाइयों को देखकर खुशी से उछल पड़ी।  किसी सहयात्री को उसने बाय-बाय कहा। रघु ने तत्काल कहा, दीदी आप बड़ी अच्छी बायर हैं। सिलसिले से अनभिज्ञ बिटिया बोली शॉपिंग ज़्यादा नहीं कर पाई पर तेरे लिए चॉकलेट हैं। हम तीनों हंसे। अकारण हंसी से बिटिया चकित हुई। मैंने कहा हम तीनों बहुत देर से लाफर बने हुए हैं। माजरा उसकी समझ में आया तो हम चारों घर तक हँसते हुए आए। बिटिया बोली हमारी कुकर ने तुम्हारे लिए अच्छा खाना बनाया या नहीं? कार तेज़ रफ्तार घर की ओर लौट रही थी। कारर भी ज़ोर से हंसा। कुक या कुकर! अब पूछोगे कि बगीची आने में देर कैसे हुई, तो जवाब ये है कि हम घर लौट कर भी हंसते-हंसाते रहे, सारे के सारे पोयमर जल्दी स्लीपर नहीं हो पाए।

—बदमास चंपू! उतारूँ का अपनौ स्लीपर!

 

 


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