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सपने किस भाषा में देखते हो

सपने किस भाषा में देखते हो

 

—चौं रे चम्पू! तू सपनौ कौन सी भासा में देखै है रे?

—सपने में पात्रानुकूल भाषाएं आती हैं चचा! भाषाओं से ज़्यादा बिम्ब होते हैं, कुछ देर याद

रहते हैं। भाषा याद नहीं रहती, भाव याद रह जाते हैं।

—बिना भासा के कैसे भाव?

—यही तो मज़ा है, सपने में शब्द-ध्वनियां उतनी नहीं होतीं, जितनी भाव-ध्वनियां होती हैं।

सपने में चूंकि हम ही उस भाषा के सर्जक-वक्ता हैं और हम ही उस भाषा के श्रोता हैं,

इसलिए वांछित शब्दों के बिना भी सम्प्रेषण सम्पन्न हो जाता है। यानी, भाव यदि किसी

शब्द-ध्वनि में रूपांतरित नहीं भी हुआ, तो भी हम अन्दर ही अन्दर भाव ग्रहण कर लेते हैं।

एक स्तर पर भाषा की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। महादेवी जी का एक गीत है ‘सपने की बात’।,

उसमें किसी सखी ने मधुयामिनी प्रसंग में कुछ पूछा, नायिका टाल गई। सखी ने इसरार

किया, बता सखि! सपने की बात! नायिका ने उत्तर दिया कि क्या बताना, अब तो मधु का

प्रात हो गया। स्वप्न में जब मुरली का पंचम स्वर मन को पुलकित करके अस्थिर कर देता

था तो मेरा नवलतिका सा गात सुख से भरकर कम्पित हो उठता था।

—महादेवी तौ बिरह की कबित्री ऐं, पर जे तौ संजोग सिंगार ऐ!

—संयोग-वियोग छोड़ो चचा! सपने की भाषा के मूल मुद्दे पर आओ! इस ‘सपने की बात’ गीत

को देखो। मुरली के पंचम स्वर की कोई शाब्दिक भाषा नहीं होती। मन का पुलकित हो जाना,

कम्पित हो कर सुख से भर जाना, नवलतिका सा गात हो जाना, उनकी चितवन का निर्झर,

मुस्कानों से झरती किरणें, कमल जैसे उनके पीले दृग, ये सब बिंब हैं। महादेवी जी को अपने

गीत में इनका वर्णन करनी था, इसलिए शब्दों की आवश्यकता पड़ी, लेकिन सपने में तो

बिम्ब-रूप दृश्य ही देखे गए होंगे न! देखे गए दृश्य का वर्णन करने की आवश्यकता तभी

पड़ती है, जब दूसरे को सुनाना हो। भाषा की ज़रूरत सपने में क्यों पड़ेगी जब मेरा ही सपना

है, मैं ही देख रहा हूं। मैंने ही भोजन बनाया, मैं ही भोक्ता हूं।

—कमाल कद्दियौ! भोजन बनात-बनात बड़बड़ायगौ कै नाय़ं?

—मैं समझ गया आपकी बात! मानता हूं कि सपने में भाषा होती है, लेकिन सपने की

डायलॉगबाजी पात्रानुकूल होती है। अब मुझे सपने में नानी दिखाई दे तो वह अंग्रेज़ी तो

बोलेगी नहीं। हमारे देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिनकी नानी अंग्रेज़ी बोलने के नाम पर

मर जाती है। सपने हमारी मातृभाषा में ही देखे जाते हैं। जैसा पात्र है, वही भाषा बोलेगा।

—फिल्मन में जिनावर बोलैं कै नायं? अपनी भासा बोलैं का?

—चचा तुम सही हो, मैं ग़लत रास्ते पर जा रहा था। कार्टून-कैरीकैचर फ़िल्मों में गधा भी

अंग्रेज़ी बोलता है, छोटा सा चूहा और हाथी भी अंगेज़ी बोलते हैं। दर्शक यही समझते हैं कि

अंग्रेज़ी पूरे विश्व और पूरे ब्रह्माण्ड की भाषा होगी। दूसरे ग्रहों से आए हुए एलियन्स

भी धरती पर आकर अंग्रेज़ी बोलते हैं। वे फिल्में अगर हम बनाने लगें चचा, तो सारे पात्र

हिन्दी बोलने लगेंगे।

—सो तौ है।

—सपने एक्शन मूवीज़ की तरह होते हैं, जिनमें संवाद न्यूनतम रहते हैं। वैसे मेरे सपने में

मेरी नहीं मेरे अवचेतन की चलेगी। अगर बराक ओबामा भी आएंगे तो हिन्दी बोलते दिखाई

दे सकते हैं मुझे। अवचेतन में भाषाई विकल्प का कोई बटन नहीं होता। जो भाषा मां के

दूध के साथ रक्त में आई है, वही हृदय के हैडक्वार्टर से मस्तिष्क के मंच पर कूटभाषा में

संदेश भेजती है। मस्तिष्क संदेश के असंख्य संकेतों की एन्कोडिंग करता है और थ्रीडी नहीं

थ्रीसिक्स्टीडी फिल्म में कन्वर्ट कर देता है, विद रूप, रस, गंध, स्वाद एंड स्पर्श।

—ख़ूब कही! अच्छा लल्ला हमाए देस में अंग्रेज़ी में सपनौ देखिबे वारे कित्ते हुंगे?

—मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भारतवर्ष में आगे आने वाले पचास वर्ष तक तो सपने

अंग्रेज़ी में आएंगे नहीं। हमारी मातृभाषाओं में आएंगे। आगे का आगे की पीढ़ी जाने। पर मैं

चाहता हूं कि आज ऐसा सपना देखूं जिसमें मेरी अनपढ़ तेजस्विनी दिवंगत नानी संयुक्त

राष्ट्र संघ के मंच पर हिन्दी के पक्ष में अंग्रेज़ी में बोले।

—वाह पट्ठे!!


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