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सांसों में समाया ग़ुस्सा

सांसों में समाया ग़ुस्सा

—चौं रे चम्पू! तू समाज में बढ़ते क्रोध कौ कारण बताय सकै का?

—क्रोध तो हर ज़माने में होता आया है। कभी सार्थक कभी निरर्थक! गुस्सा मुझे भी ख़ूब आता है।

—पर लल्ला हमनैं तोय गुस्सा होत भऐ देखौ नायं कबहुं।

—मुझे जब ग़ुस्सा आने को होता है या आ रहा होता है तो मैं आपकी बगीची पर चला आता हूं। यहां आकर सुकून मिलता है। क्रोध से बचने का यही तरीक़ा है कि अपना ध्यान क्रोध के पात्र से हटाओ और स्वयं को भी उस स्थान से हटाओ जहां आपको क्रोध आ रहा था। एकांत में मत जाना, अवसाद से घिर जाओगे। संगीत सुनो, बच्चों से बात करो, खेलो-कूदो, मस्त रहो, सकारात्मक सोचो। ध्यान लगाओ!

—जे अपने हात में ऐ का?

—हां है! एक बार भगवान बुद्ध से किसी ने पूछा कि ध्यान लगाने से आपने क्या पाया? बुद्ध भगवान बोले, पाया नहीं, खोया! मैंने उतावली, उत्तेजना, अहंकार, कुविचार खो दिए। अवसाद, असुरक्षा की भावना और लालच भी खो दिए। इसीलिए आपकी बगीची पर ध्यान लगाने आ जाता हूं।

—वैसे लल्ला क्रोध नायं आवै तौ हम मानुस कहां रए, भगवान जी है गए।

—ये बात भी ठीक है। मेरी चार लाइनें सुन लो, वही भगवान कहलाए, जिसे ग़ुस्सा नहीं आता / वही तो पीर बन पाए, जिसे ग़ुस्सा नहीं आता, मगर वह शख़्स भी कुछ कम नहीं होता विधाता से, उसे ग़ुस्सा अगर आए जिसे ग़ुस्सा नहीं आता। क्रोध न करने वाले आदमी के क्रोध को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि वहत भी क्रोधी होगा जब सीमाएं टूट चुकी होंगी। वह जो कभी क्रोध नहीं करता, लेकिन क्रोध को जज्ब करता है, वह धीरे-धीरे घुन्ना हो जाता है। क्रोध की स्थितियां अगर अन्दर विद्यमान हैं तो शरीर निर्विकारी रह ही नहीं सकता। एक आंतरिक उथल-पुथल बनी रहेगी। आप सोचेंगे कुछ और, बोलेंगे कुछ और। क्रोध दिलाने वाले व्यक्ति को अगर साफ दिल से समझाया जा सके और वह उसे आपकी कमजोरी न समझे तो उससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। मैं तो क्रोध को सबसे कीमती चीज़ मानता हूं।

—सबते कीमती! सो कैसै?

—एक मुक्तक और सुन लो, ‘क्यों तू आवेग का जख़ीरा है, हर समय आत्मा अधीरा है, क्रोध को व्यर्थ ख़र्च मत करना, क्रोध तो कोहिनूर हीरा है। वही खर्च कर दिया तो फिर क्या बचा। बार-बार का क्रोध कीर्तिनाशक होता है। कीर्ति गई तो सौन्दर्य गया। सौन्दर्य गया तो लक्ष्मी गई। क्रोधी व्यक्ति अंधे के समान बताया गया है। गुस्से के क्षणों में उसे कुछ दिखाई नहीं देता। एक पागलपन हावी हो जाता है। फिर क्रोध वैर को जन्म देता है, मन में गांठें बनाता है। वैर-भाव उसका बाईप्रोडक्ट है। कथनीय अकथनीय का विचार किए बिना क्रोधी व्यक्ति दूसरे के दिल को दुखाता है। अब जिधर देखिए चचा, गुस्सा ही गुस्सा है। देखने में लगता है कि अरविन्दकेजरीवाल को गुस्सा नहीं आता, लेकिन क्या उनसे गुस्सैल कोई आदमी है इस समय? सलमान ख़ुर्शीद साहब प्रैस कॉंफ्रेंस में बड़े संयम से काम लेते हैं, लेकिन पत्रकार अंततः उत्तेजित करके ही मानते हैं और वे भी क्रोध से फूट पड़ते हैं। ग़ुस्सा आता है। अल्बर्ट पिंटो को भी गुस्सा आता था। ममता दीदी को भी गुस्सा आताहै। अन्ना हजारे के गुस्से ने रामलीला ग्राउण्ड भर दिया। फिर सारे गुस्से पर छींटे पड़ गए। मीडिया को ग़ुस्सा फैलाना बहुत रास आता है।

—तौ भ्रस्टाचार के खिलाफ लड़ाई बेकार ऐ का?

—किसी सत्य का खुलासा हो, कोई भ्रष्टाचार सामने आए इसमें क्या ग़लत है। लेकिन चचा, आपकी बगीची पर बिना क्रोध के चिंतन करने के बाद मैं इस नतीजे परपहुंचा हूं कि भ्रष्टाचार छोटा हो या बड़ा, वह हमारे वातावरण में घुला हुआ है। हमारी सांसों में समाया हुआ है ग़ुस्सा। भ्रष्टाचार हमारी आत्मा तक में घुसपैठ कर चुका है। किसी एक पर उंगली उठाने से ये बैठने वाला नहीं है। इसको तो मिल-जुलकर मारना पड़ेगा। विश्वास के वातावरण में। बिना अहंकार, बिना वैर-भाव के। कानूननहीं हैं तो कानून बनाए जाएं। न्याय लंबित न हो। कानून अंधा न रहे। कानून कोई धंधा न रहे। कानून को कंधा देने वाले लोग जब मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं तोगुस्सा आता है चचा! चलो, थोड़ी देर ध्यान लगा लूं?

 


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6 Comments

  1. Ga..ga..ga Gussa itna haseen hai tau pyar Kaisa hoha ? Ikraar Kaisa hoga ?

  2. Ga..ga..ga Gussa itna haseen hai tau pyar Kaisa hoha ? Ikraar Kaisa hoga ?

  3. Ga..ga..ga Gussa itna haseen hai tau pyar Kaisa hoha ? Ikraar Kaisa hoga ?

  4. Chou re champu
    kuch nayi taji kah tu. .

  5. Chou re champu
    kuch nayi taji kah tu. .

  6. Chou re champu
    kuch nayi taji kah tu. .

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