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    sankochon se mukti ka nazaara

     

     

     

     

     

     

     

     

     

    संकोचों से मुक्ति का नज़ारा

    (सजनी पीछे बैठी हो तो फटफटिया हवा से बातें करती है)

     

    ट्रैफिक था घटिया,

    पर शानदार थी फटफटिया,

    सैयां की,

    पर विकट मजबूरी थी

    सजनी की बैयां की।

     

    हाथों में

    मेंहदी लगी थी गीली-गीली,

    मैंने सोचा

    कुहनियों की पकड़

    हो सकती है ढीली।

     

    मैंने देखा कि

    बलखाती रफ़्तार धुआंधार है,

    हैरानी ये कि

    सजनी के चेहरे पर

    प्रसन्नता अपार है।

     

    गिरने का डर नहीं,

    देखो, सड़क अपना घर नहीं।

     

    वाह क्या मस्ती है!

    लेकिन क्या ज़िन्दगी इतनी

    सस्ती है?

    ढंग से नहीं पकड़ा सैयां को

    तो गिर जाओगी,

    ख़ुदा न करे कि कुछ हो

    लेकिन अगर हो गया तो

    डॉक्टरों से घिर जाओगी!

     

    मुझे मेरे मन ने समझाया—

    अशोक साब!

    महसूस करिए साजन की कमर पर

    सजनी की कुहनियों का दबाव!

    ये है जोशे-जवानी,

    इसमें छिपी है

    घर के संकोचों से

    मुक्ति की कहानी।

     

     

    wonderful comments!

    1. adarshini srivastava Jul 22, 2011 at 6:30 am

      bahut achchha hai sir jawani yub hi hawa se nirbhik bateten karti hai

    2. Krishna kumar Jul 23, 2011 at 2:14 am

      It is very decent.

    3. MAYANK Jul 23, 2011 at 2:24 am

      BAHUT HI SUNDER BAAT SADHE HUE SHABDON ME!

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