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    सच्चे यही शिवाले हैं

    (वृक्ष सचमुच शंकर भगवान के अनुयायी लगते हैं)

     

    तरह-तरह के

    फल पाए जो

    वो समझो

    इनके वरदान,

    निर्धन का घर

    बन जाते हैं

    छत करते हैं

    मुफ़्त प्रदान।

    थके पथिक को

    छाया देते

    नहीं किराया लेते हैं,

    कृपा लुटाते सदा वृक्ष

    ऐसे जैसे शंकर भगवान।

     

    जहां खड़े हैं,

    वहीं खड़े हैं

    क्या तुलना

    इनके तप की,

    शीतल मंद समीर बहाकर

    देते हैं सबको थपकी।

    मधु वसंत के

    वस्त्र पहनकर

    अपने सारे अस्त्रों से,

    हर ली हरि ने

    हर विपदा

    जो माता धरती पर लपकी।

     

    कड़े तने से

    कपड़े बनते

    वैसे तन से काले हैं,

    भीतर-भीतर हैं कठोर

    पर ऊपर से

    हरियाले हैं,

    चिडि़यां यश गाथाएं गातीं

    बादल जिनको नहलाते,

    सच्ची बात यही है

    प्यारे

    सच्चे यही शिवाले हैं।

    wonderful comments!

    1. Darshan Dave अगस्त 10, 2012 at 11:59 अपराह्न

      तुकान्त और मीटर में लिखना बस कमाल की ही बात होती है कवि में .....कभी वो आनंद आ नहीं सकता गर उसके उस content और सोच की रामधुनी सी ना बन जाए...फिर पाठक को विश्वास हो जाता है एक सांगीतिक समता और स्थिरता का,कवि के हुनरमंद होने का :),उसको लगता है ...हाँ इस गाड़ी में बैठा जा सकता है , ये ज़्यादा हिलेगी नहीं हा हा ....जब कवि के सामर्थ्य से वो गति में बंधता है तो उसे यह भ्रम होता है कि वो कविता को और कवि के अथाह sense of expression को स्वयं गति में बाँध रहा है और वो खुद वहीँ चार लाइनों के बाद से ही उसमें busy हो जाता है .....और अगर आपने किसी को अपने किसी creation में शुरू से ही busy कर लिया तो आपका आधा काम तो हो गया ....इसलिये ये लयात्मक सी तुकान्त कवितायेँ ज़्यादा जल्दी लिपटती हैं ...:)

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