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  • साठवें दिन तीन सौ छियासठवां दिन

    साठवें दिन तीन सौ छियासठवां दिन

     

    —चौं रे चम्पू! आज उन्तीस फरबरी ऐ! जे दिन चार साल में एक पोत आवै! जा साल कौ नाम का ऐ रे?

    —लीप ईयर कहते हैं चचा! मौसम और वक़्त के मिजाज़ और सौर-मंडल की स्थाई घुमाई-फिराई  को सम्मान देने के लिए चार साल में एक बार साठवें दिन तीन सौ छियासठवां दिन बना देते हैं। हिन्दू पंचांग विक्रम संवत में तीन साल बाद एक पूरा महीना ही बढ़ा लिया जाता हैं।

    —अधिक मास की बात करि रह्यो ऐ ना?

    —हां, अधिक मास! हिन्दू पंचांग तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण, इन पांच आधारों पर चलता है। हर महीना तीस दिन का! पंद्रह दिन कृष्ण पक्ष के और पंद्रह शुक्ल पक्ष के। उसी के अनुसार, निश्चित तिथियों पर त्यौहार आते हैं, पर अग्रेंज़ी के कलेंडर को देखो तो होली-दीवाली की तारीखें कभीएक रही हैं क्या? विक्रम संवत बनाने वाले चन्द्रमा के हिसाब से चले। लेकिन जब देखा कि चन्द्रमा ख़ुद सूरज के हिसाब से चलता है,

    तो तीन साल बाद ’अधिक मास’ नाम का पूरा एक महीना बढ़ा दिया। तीन साल बाद मौसम फिर उसी लाइन पर आ गए।

    हिब्रू कलैंडर में उन्नीस साल बाद तेरहवांमहीना जोड़ा गया। मालूम है, नेपाल ही एक ऐसा देश है जो शासकीय स्तर पर विक्रम संवत को स्वीकार करता है।

    —हर जगह की अपनी ढपली अपने राग। अपने गीत अपनी रीत।

    —चचा! लीप ईयर में हर चार साल में एक दिन बढ़ा देना, एक तरह की लीपापोती है। चार साल तक समय और समाज को लेकर जो भूलें की जाती रहीं, उन पर एक दिन लीपापोती करके दुरुस्त कर लो। मध्यकाल और पूर्वमध्यकाल में जो राजा हुआ करते थे, अगर युद्ध में मर-मरा न जाएं, तोतीन से उन्नीस साल तक का शासन हुआ करता था। उतना वक्त बीत जाता था तो अगला शासक समय-गणना को दुरुस्त कर लेता था। हमारे देश में जनतंत्री शासक पांच साल तक गद्दीनशीं रहते हैं। चार साल तक मनमानी करते हैं

    और पांचवे साल के आगमन पर लीपापोतियां शुरू हो जाती हैं,इसलिए लीप ईयर रास आता है। केंद्र में देखो या प्रांतों में,

    शासन-प्रशासन, खेल-शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास सब में लीपापोती के प्रयास जारी हैं। इन दिनों सब मानते हैं कि भ्रष्टाचार है,

    पर सशक्त संविधान और न्यायपालिका कभी आंदलनों से परास्त होते दिखाई देते हैं, कभी पलटकरआक्रामक हो जाते हैं। बहरहाल,

    आंदोलनकारी भी लीपापोती करते हैं और शासक भी। संसद में बैठे लोग हत्यारे, बलात्कारी और दुष्कर्मी हैं, ऐसा कहने वाले अपने

    गिरेबान में नहीं झांकते। समय के अनुकूल जो कदम उठाए जाने चाहिए, जैसे कि सोलर-सिस्टम को देखकर लीप ईयर में उठायाजाता है,

    हमारा पावर-सिस्टम ऐसा नहीं करता। पावर भले ही कहीं की भी हो।

    —कहीं की बी होय ते का मतबल ऐ तेरौ?

    —जैसे खेल को ही ले लो। हॉकी में फ्रांस को हराने से ओलंपिक का दरवाज़ा तो खुल गया है पर ओलंपिक पदकों की गारंटी थोड़े ही हुई है।

    और होने लगी गुणगानों से लीपापोती।

    —तोय तौ हर चीज में खोट नजर आवै ऐ चम्पू! जीते ऐं तो जीत की खुसी ना मनामैं का?

    —वह बात नहीं है चचा! निंदा भी हौसला बढ़ाने का एक औज़ार होती है। निश्चित रूप से मैं भी उस संदीप का अभिनंदन करता हूं

    जिसने हॉकी में दनादन-दनादन पांच गोल ठोक दिए। भले ही अभी आंगन भर धूप न मिली हो, छप्पर के छेद से उम्मीद का उजाला

    तो आया है। दूसरी तरह कीलीपापोती का

    नज़ारा क्रिकेट में देख लो। सचिन को महानतम बना कर फुल टायर फुलाया और अब उसे रिटायर करने पर आमादा हैं। कप्तान साहन

    पहले बयान दे देते हैं

    और फिर बयानों पर लीपापोती करते हैं।

    —राजनीत के खेल में तौ हर दिन लीपापोती होय।

    —छ: मार्च को जब चुनावों के नतीजे आ जाएंगे तो नए तरह की लीपापोतियां शुरू हो जाएंगी। हार गए तो हार का ठीकरा अपनी ही पार्टियों

    के नेताओं के सर पर फोड़ देंगे। जीत गए तो अपने अपने मस्तक पर श्रेय की लिपाई-पुताई कर लेंगे। गठबंधन की नौबत आई तो चुनाव के

    दौरानएकदूसरे के लिए बोले गए कड़वे वचनों को लीप देंगे। इस लीप ईयर में लिपा-पुताई जारी रहेगी। चचा, गांव की औरत इस लीप ईयर में भी गोबर ही लीपेगी।

     


     

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