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    रम्या और विनीथा की वंदना में

    (कोलकाता में मरीज़ों को बचाते हुए दो युवा नर्सों ने अपने प्राणों की बलि दे दी)

     

    दिव्य दिवंगत नर्स रम्या और विनीथा!

    वहां हर कोई तुम्हारा ऋणी था।

    ऋणी है और ऋणी रहेगा,

    इंसानियत का हर ज़र्रा यही कहेगा—

     

    दृश्य जहां था हाहाकारी,

    युवा चेतना वहां न हारी।

    चौबिस की थीं दोनों नर्सें,

    पीड़ा पर करुणा बन बरसें।

    आग धुंए की आपाधापी,

    इन्हें न कोई चिंता व्यापी।

    कुटिल काल क्रीड़ा कराल थी,

    हिम्मत इनकी बेमिसाल थी।

    तड़प रहे थे बेबस रोगी,

    निश्चित ही था दुर्गति होगी।

    दमघोंटू था धुआं भयानक,

    तन को झुलसाता था पावक।

    मृत्यु अचानक खुल कर नाची,

    यम ने अपनी पोथी बांची।

    गूंज रही थीं कलप-कराहें,

    सांसों की जो भिक्षा चाहें।

    जीवन बनीं विनीथा-रम्या,

    धुंए-धांस में सांस सुरम्या।

    जिनको थे जीवन के लाले,

    एक एक कर आठ निकाले।

    ये दोनों कोमल कन्याएं,

    उठा-उठा कर बाहर लाएं।

    बाहर से फिर जाएं अंदर,

    हिम्मत का बन एक समंदर।

    नवां मरीज़ अपाहिज भारी,

    आग हो गई प्रलयंकारी।

    चारों ओर धुआं ज़हरीला,

    ख़त्म कर गया इनकी लीला।

    परहित अपने प्राण गंवाए,

    सबने अपने शीश झुकाए।

     

    जिन्होंने आहुति दी निष्काम,

    रम्या और विनीथा को प्रणाम!

     

    wonderful comments!

    1. S L RATHI Dec 14, 2011 at 1:39 pm

      manavata ko leel rahi thi agni,manav ki seva mein rahti thi dono,khud ko sonpa agni ko aur manavta ko bacha liya....dhanya hai RAMYA....dhanya hai vinitha

    2. राजेश निर्मल Mar 4, 2013 at 12:47 am

      रम्या और विनीथा को प्रणाम!

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