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रात काली चंद्रमा अकेला

रात काली चंद्रमा अकेला

 

—चौं रे चम्पू! हाल-फिलाल कोई किताब पढ़ी का?

—चचा याद नहीं मुझे!

—यानी कै तैनैं पिछले दिनन में कछू पढ्यौ ई नायं! सच्ची बात बोल ना!

—क्या सच्ची बात! क्यों याद रखूं कोई बात? क्या मुझे भूलने का अधिकार नहीं है? हर दिन दो तीन किताब सामने आतीं हैं, पर क्यों याद रखूं?

—बहू ते गारी खाय कै आयौ ऐ का? हत्था ते ई उखड़ौ भयौ ऐ! का गल्ती है गई जो पूछ लई हमनै? अच्छा चल भूल जा किताबन्नैं! जे बता कै भिन्नौटी चौं खाय रह्यौ ऐ?

—चचा अपने मौहल्ले में कुछ ऐसे निर्जीव लोग हैं जो करते–धरते तो कुछ हैं नहीं, झूठी निंदाओं से काम नहीं होने देते। उनके साथ कुछ अपने घर के लोग भी मिले हुए हैं

जो अपनी कमियां ढकने के लिए सारा दोष मेरे मत्थे डाल रहे हैं।

—लल्ला याद रक्खौ कै कमजोर के प्रति सहानभूती होयौ करै और ताकतवर की होय आलोचना।

—फिर वही बात! मैं ही क्यों याद रखूं हर चीज़? अपने काम निष्ठा से करता हूं, मेरी प्रतिष्ठा का फलूदा क्यों बना रहे हैं। मोहल्ले के हर बुरे काम का ज़िम्मेदार मैं ही हूं क्या?

—जिम्मेदारी ते पल्ला कैसै झाड़ैगौ रे? तोय मुखिया बनायौ ऐ तौ सबकी सुन्नी पड़ैगी, धीरज धन्नौ पड़ैगौ। तू अपने आप में सई ऐ फिर फिकर काए बात की, लेकिन सब चीज याद रखनी पड़िंगी। अच्छा बता कोई किताब सच्चेई अच्छी लगी का?

—याद रखने पर याद आया, कल मनमोहन का काव्य-संकलन ’ज़िल्लत की रोटी’ पढ़ा था। मनमोहन को तो तुम जानते हो, मेरा किशोरावस्था का मित्र है। सन पैंसठ के करीब मथुरा में मिला था। बहुत अच्छा कवि है। मैं तो बचपन से मंचों पर मुखर हूं, लेकिन ये प्रखर कवि ज़्यादातर चुप रहताहै।

उसकी कविताएं ज़्यादा बोलती हैं। मुझसे तीन साल छोटा है, पर मैंने अपनी पहली पुस्तक ’मुक्तिबोध की काव्य-प्रक्रिया’ जो सन उन्नीस सौ पिचहत्तर में छपी थी, उसी को समर्पित की। मैकमिलन प्रकाशन के सम्पादक माहेश्वर ने मुझसे पूछा, ये मनमोहन कौन हैं? मैंने कहा बहुत बड़े कवि हैंमाहेश्वर जी, आपको पता नहीं! ‘राजा का बाजा’ नहीं पढ़ी क्या? वे बोले, हां पढ़ी है, अच्छी कविता है, सचमुच बड़े कवि हैं। अपनी पुस्तक आप इन्हीं को समर्पित करिए।

चचा, सातवें, आठवें दशक की हर प्रगतिशील लघु पत्रिका में मनमोहन की कविताएं रहती थीं। ‘उत्तरार्ध’, ‘वाम’, ‘क्यों’, ‘ओर’, ‘पहल’, ‘सामयिक’, ‘नयापथ’ कोई सी पत्रिका उठा लीजिए, मनमोहन की कविता ज़रूर मिलेगी। बीच में कुछ दिन मनमोहन साहित्य जगत से ग़ायब रहा। मैं भी शिकायत करता रहा कि भाई कोई काव्य-संकलन तो आए। इसी छः जून को मिला तो उसने किताब थमा दी, लो तुम्हारीशिकायत दूर कर दी। मैंने पलटकर देखी तो राजकमल द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक पर प्रकाशन वर्ष दो हजार छः छपा था।

यानी पुस्तक भेंट करने में भी छः साल लगा दिए। संकलन की हर कविता को कई बार पढ़ने का मन करता है।

इसी संकलन में एक कविता है, जिसका शीर्षक है ’याद नहीं’।उसमें मनमोहन कहता है, ’स्मृति में रहना / नींद में रहना हुआ / जैसे नदी में पत्थर का रहना हुआ।

ज़रूर लम्बी धुन की कोई बारिश थी / याद नहीं निमिष भर की रात थी / या कोई पूरा युग था। एक तकलीफ थी / जिसके भीतर चलता चला गया /

जैसे किसी सुरंग में। अजीब ज़िद्दी धुन थी / किहारता चला गया। दिन को खूंटी पर टांग दिया था / और उसके बाद क़तई भूल गया था। सिर्फ़ बोलता रहा/ या सिर्फ़ सुनता रहा / ठीक-ठीक याद नहीं।’ पिछले दिनों मैं भी क्या बोलता रहा, क्या सुनता रहा, क्या चाहता रहा, चाहतें पूरी न होने पाईं तो छटपटाता रहा। धीरे-धीरे चीज़ें मेरी समझमें आईं कि क्यों घर के ही लोग विकास के विरोधी हैं और कुछ नहीं होने देना चाहते।

—चित्त में सांती रख। काम ते बड़ौ कोई जवाब नायं होय।

—इसीलिए फिलहाल कुछ याद नहीं रखना चाहता, लेकिन खुद को इस ग़लतफहमी का शिकार भी नहीं होने दूंगा कि मुझे कुछ याद नहीं है। चलते-चलते मनमोहन की कविता का एक टुकड़ा और सुन लीजिए, ‘दुखद कहानियां जागती हैं / रात ज़्यादा काली हो जाती है / और चन्द्रमा ज़्यादाअकेला।’


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