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  • रात और दिन की आंख-मिचोली

    (सारे खेल जीते-जी ही देखे जा सकते हैं)

     

    मुस्कानों की मीठी यादें,

    बहते आंसू की फ़रियादें।

    प्यार मुहब्बत, हंसना रोना,

    सज़ा मज़ा, पा जाना खोना।

    महल दुमहले, बंगले कोठी,

    चना-चबैना, सूखी रोटी।

    क्या रोटी पर देसी घी है?

    जो कुछ भी है

    जीते जी है!!

     

    झूले चर्खी, मेला ठेला,

    झुमके ठुमके, कुश्ती खेला।

    खेल-खिलौने, खील-बताशे,

    जोकर के रंगीन तमाशे।

    छीनाझपटी, मारामारी,

    घोड़ा-तांगा, रेल सवारी।

    क्या मन के माफ़िक तेज़ी है?

    जो कुछ भी है

    जीते जी है!!

     

    गहने-ज़ेवर की संदूकें,

    संदूकों में हैं बंदूकें।

    बंदूकों में छर्रे-गोली,

    गोली में है ख़ूं की होली।

    होली खेलें बीच बजरिया,

    सबकी उसने लिखी उमरिया।

    क्या तुमको काफ़ी भेजी है?

    जो कुछ भी है

    जीते जी है!!

     

    क़ुदरत के भरपूर नज़ारे,

    प्यारे सूरज, चंदा, तारे।

    रात और दिन की आंख-मिचोली,

    सैंया, गलबहियां, हमजोली।

    ख़ूब महकती थी फुलवारी,

    लेकिन भैया, जान हमारी,

    वक़्त से पहले क्यों ले ली है?

    जो कुछ भी है

    जीते जी है!!

     

    wonderful comments!

    1. Urmila Madhav Sep 21, 2012 at 4:33 pm

      yahi zindagi ki sachchayi hai....

    2. Rahul Parmar Sep 21, 2012 at 10:16 pm

      nice poem.... Jo kuch bhi hai jee te jee hai....

    3. Rahul Parmar Sep 21, 2012 at 10:16 pm

      nice poem.... Jo kuch bhi hai jee te jee hai....

    4. Rahul Parmar Sep 21, 2012 at 10:16 pm

      nice poem.... Jo kuch bhi hai jee te jee hai....

    5. Sunil Sep 22, 2012 at 5:38 pm

      Jindgi ki value pata chali iss poem ko pad k.

    6. Arobinda Dhar Sep 24, 2012 at 12:02 am

      Bahut Sundar!

    7. Arobinda Dhar Sep 24, 2012 at 12:02 am

      Bahut Sundar!

    8. Arobinda Dhar Sep 24, 2012 at 12:02 am

      Bahut Sundar!

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