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  • प्यारा हाथ / चक्रधर चित्रशाला
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    wonderful comments!

    1. मोनिका गुप्ता May 11, 2011 at 1:52 pm

      मेरी मुनिया प्यारी छुनिया नन्हे हाथो से लेकर सहारा,अब देखेगी जहाँ सारा मुनिया ,तू आन बनना,शान बनना,नन्हे पग धरा पर धरते हुए देश मे अपनी अलग पहचान रखना मत धबराना, ना डगमगाना बस आगे ही आगे तू बढती जाना मेरी मुनिया,प्यारी छुनिया..... ( अशोक जी बच्चो पर मैने कभी कोई कविता नही लिखी यह मेरा पहला प्रयास है) धन्यवाद मोनिका गुप्ता

      1. ashokchakradhar May 11, 2011 at 1:59 pm

        मेरी मुनिया,प्यारी छुनिया….. बहुत अच्छा प्रयास है मोनिका! नन्हे हाथो से लेकर सहारा,अब देखेगी जहाँ सारा, बहुत खूब

        1. मोनिका गुप्ता May 12, 2011 at 12:29 pm

          बहुत बहुत धन्यवाद अशोक जी आशा है आप आगे भी हमे मौका जरुर देंगे मोनिका गुप्ता

    2. nikhil pandit May 11, 2011 at 3:00 pm

      सपनों का वो सार ढूँढता दिल में बसा घरबार ढूँढता लम्हा लम्हा छू छूकर वो कुछ शीशे के पार ढूँढता नन्ही नन्ही आखों में वो प्यार भरा संसार ढूँढता चलने को इस राह कठिन पर कोई नन्हा सा यार ढूँढता भूख लगी तो रो रोकर वो ढूँढता माँ का साथ हाय-बाय का राजगार ये प्यारा नन्हा हाथ

      1. ashokchakradhar May 11, 2011 at 3:28 pm

        भई निखिल आप तो अच्छा लिख लेते हैं। बस शिल्प का हल्का सा स्पर्श चाहिए!

    3. rajendra dutt kaushik May 11, 2011 at 3:04 pm

      नन्हा नन्हा ,प्यारा प्यारा करता हाथ इशारा है मत आपस मैं बैर करो ये सारा जहाँ हमारा है द्वेष इर्ष्या मन से त्यागो, मत आपस मैं द्वंद्ध करो बच्चों का मत खून बहाओ,धर्म लड़ाई बंद करो

    4. ashokchakradhar May 11, 2011 at 3:59 pm

      कौशिक जी, अच्छे मुक्तक के लिए बधाई!

    5. nikhil pandit May 11, 2011 at 4:35 pm

      thanx sr aapke sanidhy main vah bhi ek din to prapt hoga hi

      1. ashokchakradhar May 12, 2011 at 3:04 pm

        मेरी शुभकामनाएँ

    6. rajendra dutt kaushik May 11, 2011 at 4:36 pm

      dhanyvaad shri maan

    7. guarav sharma May 12, 2011 at 3:39 am

      wo kal hi to tha jab tu ghar mere ayi thi ,in nanhe nanhe hatho me kismat meri tu layi thi...wo kal hi to tha jab in hatheli me meri ungli tu kas k jakada karti thi,nadan bholepan me pratibimb pakda karti thi ....wo kal hi to tha jab tu mujhse ek pal bhi dur na rahti thi,piya ghar na jaungi baba aksar essa kahti thi..... wo kal hi to tha mujhse sab akasar essa kahte hai, par kya karu beti wo lamhe kal k mere aaj me bikhre rahte hai aaj lagan hai..hai jana tujhko...hai ghar naya basana tujhko.. kahna hai bas yahi..wo sneh kal bhi rakhna ..jo kal bhi to tha

      1. ashokchakradhar May 12, 2011 at 3:09 pm

        गौरव आपने तो कल्पना को अपार विस्तार दे दिया। संवेदनशील सोच के लिए बधाई!

        1. guarav sharma May 14, 2011 at 12:45 am

          thank you sir......

    8. Mallika Mathur May 12, 2011 at 6:32 am

      जो मैं छूना चाहूँ, उस नीले अम्बर को जो मैं पाना चाहूँ, बादल के एक टुकड़े को जो मैं पंख फैलाऊं, ऊँचे उड़ने को मेरा नन्हा हाथ थाम के माँ, मुझे सिखाना तुम

      1. ashokchakradhar May 13, 2011 at 6:55 pm

        इस संवाद की अनुगूँज दूर तक जाती है। बधाई!

    9. नवीन कुमार पाठक May 12, 2011 at 7:10 am

      जब देखा तो आर पार, और बढ़ा हाथ तो थी दीवार दीवार - नहीं जो दिखती थी, भरपूर हथेली टिकती थी अनुभव ये एक नया हुआ, मैंने अदृश्य को अभी छुआ अब बहुत हुआ, रास्ता मोडूँ, पर शब्दकोष में क्या जोडूं | नन्ही मुन्नी ये काँच है, और बाहर इसके आँच है ये माँ कि ममता जैसा है, दिखता ही नहीं बस ऐसा है इसके बाहर दुनिया देखो, तितली देखो बगिया देखो देखो सीखो हर चीज़ नयी, पर छोटी हो सो रहो यही |

      1. ashokchakradhar May 13, 2011 at 6:57 pm

        काँच और आँच का बहुत सार्थक प्रयोग किया है नवीन आपने! अदृश्य को छूने का अनुभव... क्या बात है!

        1. नवीन कुमार पाठक May 17, 2011 at 5:14 am

          आदरणीय अशोक जी, सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद| अन्ततः मेरा एक प्रयास आप तक पंहुचा तो... आपके के द्वारा एक और चित्र कि प्रतीक्षा रहेगी|

    10. संतोष पयासी May 12, 2011 at 9:52 am

      मत पूँछ मनोरथ बाल कि, प्रीति, अथाह, समान, पले निखरे | निज काम भरा जन जीवन लोक, अजान अबोध तमाम परे | पितु मातु कि भाँति नहीं जग में, सुत खातिर जीवन हाँथ धरे | मन कि अति चाह विनोद करें, सुत सम्मुख दर्पण एक धरे || हर बार टटोल टटोल मज़ा, कर से शिशु कांच विनोद करे | एक बार नहीं हर बार नई तरकीबहि भाव विभोर करे | चित चोर हंसी पितु मातु कि ओर निहारि बड़ी किलकारि भरे | उर को अति चैन सुकून मिला, सुत कोशिश देखि सभी बिसरे || - धन्यवाद्, संतोष पयासी

      1. ashokchakradhar May 13, 2011 at 7:02 pm

        वाह पयासी जी! आपके कवित्त ने सिद्ध कर दिया की इस शिल्प में कितना लालित्य है। तुकांतों के अद्भुत निर्वाह के लिए बधाई! 'सुत कोशिश देखि सभी बिसरे।' की लंबी भूमिका बनाई आपने! वाह!!

        1. संतोष पयासी May 14, 2011 at 10:20 am

          बहुत बहुत धन्यवाद् अशोक जी! आपसे मिलने कि अभिलाषा थी मन में?

      2. नवीन कुमार पाठक May 17, 2011 at 5:18 am

        पयासी जी, आपसे परिचित तो नहीं हूँ, लेकिन आपकी रचना पर आपको बधाई देने से खुद को रोक नहीं पाया, काव्य रचना कि इस विधा से साछात्कार अब कम ही होता है|

        1. संतोष पयासी May 23, 2011 at 3:10 pm

          बहुत बहुत धन्यवाद् नवीन जी!

    11. Rajesh Saxena "Rajat" May 13, 2011 at 5:54 am

      कान्हा कहे माई कछु देखो, पार महा माया अति देखो. मैं तेरा, तू ही मेरी, हाँ, मैं तुझमें, तू ही मुझमें, छू-छू कर मुझको तुम देखो.

      1. ashokchakradhar May 13, 2011 at 7:04 pm

        रजत जी! माई क्या कहेगी, ज़रा और आगे सोचिए, कविता अच्छी बनेगी।

        1. Rajesh Saxena "Rajat" Sep 11, 2012 at 8:02 pm

          सर, प्रणाम, आप का आशीर्वाद सदैव बना रहे ... आज्ञानुसार .... "माँ की ममता को हे कान्हा, माया कबहूँ न छू पाए, जिस माँ के हृद बसा है कान्हा, माँ कान्हा ही हो जाए."

    12. Amit Dwivedi May 17, 2011 at 7:03 pm

      अपलक निरखत, आपहिं किलकत, खेलत बिम्ब के साथl ललक ललक निज छवि को पकड़त; ह्वै मुदित बढ़ावत हाथ ll

    13. amar May 22, 2011 at 6:56 am

      आस्थाएं अरमान और ख्वाब, मन में सन्जोए ये नन्हे जनाब! मानो रौशनी को ललकार रहे हैं, और ढलते सूरज को पूकार रहे हैं, घबराना नहीं वक्त से पहले आना नहीं, तब तक मैं टिमट्माउंगा, हर तरफ रौशनी फैलाउंगा...

    14. Rajesh Kumar Jun 6, 2011 at 7:55 am

      प्यारा हाँथ बढ़ाये अपना -लिए सहारा 'पैयां -पैयां चलना सीखे बचपन प्यारा नहीं लौटकर ये आयेगा कभी दोबारा भोला -भाला क्या जाने चतुराई बिचारा

    15. Divya Nishant Ranote Jun 11, 2011 at 11:07 am

      Masoom armaan shoo rahe duniya ko bachpan ke chilman se; door kahin anjaan se duniya ki uljhan se. pushap sunehra aatur hai khushboo se milne ko, khol jivan ki pankhudiyaan is jag mein khilne ko. chilman ke uthte hi armaan lakshya ho jayenge, uljhano ko bhedte hue ye hath lakshya ko payenge. khushboo ke saath saath khud mein kaante bhi ugaane honge, Bal kanhaiya ki tarah maakhan ke sath sath dil bhi churaane honge !

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