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प्रेम की टाइमलाइन

प्रेम की टाइमलाइन

—चौं रे चम्पू! प्रेम कौ रंग लाल चौं मानौ जाय?

—इसलिए, क्योंकि ख़ून का रंग भी लाल होता है। जब तक वह हृदय की धमनियों में दौड़ता रहता है, प्रेम भी बना रहता है। बाहर निकलते ही कत्थई हो जाता है। फिर गाढ़ा और गाढ़ा। काला हो जाता है। प्रेम तभी तक बढ़िया होता है, जब तक कि वह अन्दर हृदय में रहे। प्रेम का रंग दूसरे को अपने रंग में रंग लेता है और दूसरा भी ऐसा ही लालमलाल हो जाता है। लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल, लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।

—तौ प्रेम एक बार होय कै कई बार है सकै?

—चचा, वैसे तो एक बार ही होता है, लेकिन पुनर्पुनरपि हो सकता है। अगर आपस में पटरी न बैठे, दोनों में से कोई एक धोखा दे, दोनों एक दूसरे पर भरोसा न करें,संदेह की ओवरडोज़ हो जाए, अहंकार जी पति-पत्नी के बीच ‘वो’ बन जाएं, दिल्ली सरकार की तरह सड़क पर प्यार आ जाए, अनपेक्षित कारणों से प्रेमी बिछुड़ जाएं, कोई एक सदा के लिए आंख मूंद ले, तो हो सकता है। हां, प्रेम यादों से तो नहीं निकल सकता, ज़िन्दगी से निकल सकता है। रीते घट को जीवन-घाट पर फिर से प्रेम का लाल शरबत चाहिए। वो गाना सुना है?

—कौन सौ गानौ?

—‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ फ़िल्म का, ‘मैं रंग शरबतों का, तू मीठे घाट का पानी, मुझे ख़ुद में घोल दे तो, मेरे यार बात बन जानी।’ शरबत रंग-बिरंगे होते हैं। केले का शरबत हरे रंग का होता है, संतरे का लाल। अब अगर सारे रंग रखने वाला प्रेम हो तो पानी को गंदा करेगा और अगर लाल रंग पुख्ता हो तो घट और घाट लालमलाल हो जाएंगे। बात बनेगी ऐसी कि कभी बिगड़ेगी नहीं।

—जे बता लल्ला, सुनन्दा पुस्कर नैं थरूर ते प्रेम कियौ कै मतलब के ताईं ब्याह कियौ?

—चचा, प्रेम में मतलब का क्या मतलब? प्रेम हुआ, शादी कर ली। एक अरब की सम्पत्ति की मालकिन थीं। ऐसा लगता है कि थरूर के प्रति नारियों का और नारियोंके प्रति थरूर का आकर्षण भाव देख कर स्वयं असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो गईं। कोरे आकर्षण भाव से विचलित नहीं होना चाहिए। बहरहाल, प्रेम लाइन परनहीं रहा, ट्विटर की टाइमलाइन पर आ गया। बाकी, अन्दर की कहानी मैं कैसे कह सकता हूं?

—दौनौन कौ तीसरौ ब्याह हतौ जे?

—सब तो मालूम है आपको, फिर क्यों पूछ रहे हैं?

—सबरी बात नायं पतौ, टीवी पै नैंक सी खबर देखी हती।

—पहला विवाह ईगो जैसी समस्या के कारण नहीं निभा होगा। सुनंदा, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति करने वाली कर्मठ नारी थीं। दूसरे विवाह को निभा रहीथीं, लेकिन पति मेनन दुर्घटना में दिवंगत हो गए। महत्वाकांक्षी तो थीं ही। काम भी एडवरटाइजिंग एजेंसी, प्रॉपर्टी इंवैस्टमेंट और ईवैंट मैनेजमेंट का था। रुपए से रुपए पैदा करना और अपने सौन्दर्य को पेज थ्री पर बनाए रखना उन्हें आता था।

—पूरी दुनिया घूमी वानैं!

—हां, उनका परिचय घेरा बहुत बड़ा था। कनाडा रहीं, दुबई रहीं। नामी-गिरामी लोगों से मिलती रहीं, क्योंकि व्यवसाय ही ऐसा था और जिनके परिचय घेरे बड़े होते जाते हैं, वे अगर अपना मानसिक संतुलन को खो बैठें, बहते पानी के साथ अपने आपको बहने के लिए छोड़ दें तो दिक़्क़तें आ सकती हैं चचा। मैंने आपसे पहले भी कहा था कि कितनी ही संस्कृतियां रही हों धरती पर, लेकिन दो संस्कृतियां तो निश्चित रूप से हैं, जिनमें प्रेम के साथ तक़रार निरंतर चलती रहती है। एक पुरुष संस्कृति और एक नारी संस्कृति। ये दोनों आमने-सामने होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों रचना हैं चराचर की, ताक़त हैं बराबर की। हमारे यहां अर्धनारीश्वर का बिम्ब बना, जहां दोनों एक हो जाते हैं। नस-नाड़ियां में एक ही रक्त होता है तो विभक्त होने की नौबत नहीं आती।

—थरूर की ऊ गल्ती रई होयगी लल्ला!

—ज़रूर रही होगी। प्रेम मार्ग में शाखाएं खोलते ही गड़बड़ी होती है। इमोशनल इंटैलिजेंस का कोर्स करने वाली सुयोग्य सुनन्दा में इन मामलों को लेकर कितनी बुद्धिमत्ता थी, ये भी नहीं कहा जा सकता। बहरहाल, प्रेम की टाइमलाइन ठहर गई। ये आवेगों की कहानी थी, संदेहों के रथ पर चली, समर्पणविहीनता की स्थिति में सांस लेना चाहती थी, घुट के मर गई, और क्या!

 


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1 Comment

  1. बहुत ही रोचक लगा पढने में.

    हमेशा यूँ ही लिखते रहिये
    आपका नित्य-पाठक
    http://www.sansarlochan.in

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