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    प्रेम कैसे हो आधा-आधा

    (प्रेम पूर्ण देकर प्रतिदान में पूर्ण ही चाहता है)

    श्रीमान जी बोले—

    एक ग़ज़ल हुई है

    बहुत दिन के बाद।

    मैंने कहा— इरशाद, इरशाद!

     

    आती नहीं है उसके

    जीवन में कोई बाधा,

    राधा ही रुक्मिणी हो

    और रुक्मिणी हो राधा।

     

    जब पूर्ण दे रहा है

    तो पूर्ण तुमसे चाहे,

    कैसे भला हो पाए

    ये प्रेम आधा-आधा।

     

    प्रेमी जो साथ ना हो

    तो प्रेम साधना है,

    इस प्रेम साधना को

    मुश्किल था, जिसने साधा।

     

    नी सा भी ज़रूरी था

    आरोह में जो गाते,

    सरगम ठहर गई क्यों

    आया जहां पे पा धा।

     

    सुख के हज़ार कंधे

    सुख की हज़ार बांहें,

    दुख दफ़्न हो के सो जा

    मिलना न कोई कांधा।

     

    मैंने कहा—

    वाह!

    क्या टीस, क्या कराह!

    लेकिन बाधा, राधा

    आधा साधा

    और पा धा के बाद

    कांधा?

    ग़लत है काफ़िया!

    लेकिन मज़ा ला दिया।

     

    wonderful comments!

    1. Indra Hirwani अगस्त 16, 2012 at 10:19 अपराह्न

      प्रेम न होगा आधा आधा, जब हो जायेगा साझा साझा !!

    2. Indra Hirwani अगस्त 16, 2012 at 10:19 अपराह्न

      प्रेम न होगा आधा आधा, जब हो जायेगा साझा साझा !!

    3. Indra Hirwani अगस्त 16, 2012 at 10:19 अपराह्न

      प्रेम न होगा आधा आधा, जब हो जायेगा साझा साझा !!

    4. yogendra signh tihawali fatehpur shekhawati sikar rajasthan अगस्त 21, 2012 at 5:34 अपराह्न

      नमस्कार अशोक जी , मै आपके सम्मुख एक छोटी सी कविता बोलना चाहता हूँ ! अगर आपको पसंद न आये तो मुझे जरुर बताना क्यों की मुझे बिलकुल भी बुरा नही लगेगा ! सपनो की दुनिया से थोडा बाहर तो आइये , कैसा है जनाब का हाल तो सुनाइये ! सपने तो सपने है हकीकत जमीनी है , कदम -कदम पे धोखे देगी जिन्दगी बड़ी कमीनी है , उतार के आसमान से जिन्दगी को जरा धरती पे ले आइये ! उतार के चश्मा आँखों का असलियत को निहारो , जो जमीनी हकीकत है ना तुम उसको ही बिसारो , सच का सामना कीजिये ना सपने हरदम देखे जाइए ! गर होंगे सितारे गर्दिश में तो जमाना साथ खड़ा होगा , वक़्त बुरा जब आएगा तो अकेला कहीं पड़ा होगा , जमीं पर कभी न देख लो ना सदा आसमान को तुम निहारिये ! दो जून की रोटी से जूझना है जिन्दगी तेरी , बे वक़्त मौत से लड़ना है जिन्दगी तेरी , छोड़ के सपनों का बिस्तर '' नामा '' हकीकत की चादर बिछाइये ! ........धन्यवाद !!! योगेन्द्र सिंह तिहावली राजस्थान

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