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प्रेम घृणा में तब्दील न हो

प्रेम घृणा में तब्दील न हो

 

—चौं रे चम्पू! कोई नई अनहौनी भई होय सो बता। है कोई?

—चचा, अनहोनियां होना तो प्रकृति का नियम है। भूमण्डल पर अनहोनियां न हों तो हमारा ह्रास या विकास कैसे हो! विकास कई बार ह्रास लगता है और ह्रास लगने जैसी अनहोनी में विकास के बीज छिपे हो सकते हैं। एक ताज़ा उदाहरण देता हूं। अभी तक लड़के प्रेम में कुंठित होकर लड़कियों के चेहरों पर तेज़ाब फेंका करते थे। शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी लड़की ने लड़के के चेहरे पर तेज़ाब फेंका। स्वभाव का पता नहीं, लेकिन लड़का नाम से विनीत है। भक्ति का पता नहीं, लेकिन लड़की नाम से आरती है। पच्चीस की आरती और अट्ठाइस के विनीत का प्रेम पांच वर्ष से चल रहा था।

—जे ख़बर पढ़ी ई मैंनैं। अटपटी सी लगी।

—क्यों अटपटी लगी आपको? लड़के फेंकें तो अटपटा नहीं है! लड़की फेंके तो अटपटा है। वैसे तो जो भी फेंके, अपराध है। प्रेम-प्रसंग अपराधों से सदा से जुड़े रहे हैं। जहां भी समाज द्वारा अथवा प्रतिकूल परिस्थिति आने पर प्रेमी अथवा प्रेमिका द्वारा प्रेम को मान्यता नहीं मिलती, वहीं विग्रहकारी स्थितियां प्रकट होने लगती हैं। दिल-दिमाग़ हिंसात्मक हो जाते हैं।

—प्रेम बड़ौ इकलखोर होय लल्ला!

—हां, पर-प्रवेश को अनुमति देता नहीं है। जैसे ही संदेहजनक स्थितियां दिमाग़ी विकार पैदा करती हैं, प्रेम घृणा में रूपांतरित होकर बदले की भावना में बदल जाता है। आई लव यू, लाइक आई हेट यू, आई हेट यू लाइक आई लव यू। अतिशय प्रेम का रूपांतरण अतिशय घृणा में हो जाता है और अनहोनी कराता है। बाद में भले ही पछताते रहो, लोहे अथवा अपनी आत्मा के सींखचों के पीछे। पुरुष प्रधान समाज में दबदबा लड़कों का रहा करता है। लड़कियां बिचारी लाजवंती।  तेज़ाब डलवाने के बाद भी कलंकित मानी जाएंगी कि इसी कुलच्छनी के करतब ऐसे-वैसे रहे होंगे। कलंकी मुस्कुराते रहे हैं, कलंकिनी पर आरोपों और पत्थरों की बौछार होती रही है। अब समाज मे परिवर्तन आ रहा है। फिल्मों, धारावाहिकों और विज्ञापनों में देखिए। एक विज्ञापन कहता है कि जैसे चाय के लिए टोस्ट ज़रूरी होता है, वैसे हर एक दोस्त ज़रूरी होता है। बात में तुक नहीं मिली है, लेकिन आज के समाज को देखते हुए बेतुकी भी नहीं है। लड़कियों का माइंड-सैट बदल रहा है। उन्हें अब समाज और थोपी गई मर्यादाओं की ज़्यादा परवाह नहीं है। जो छूट समाज से पुरुष लेता रहा है वह छूट अब स्त्री भी लेना चाहती है। अफ़सोस कि कम्बख़्त लड़के उतने नहीं बदले हैं, शादी के लिए उन्हें सती-सावित्री ही चाहिए। घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने के लिए तो हर वक्त तैयार। सिनेमा देखना हो तो चलो, रेस्टोरेंट जाना हो तो चलो, लेकिन शादीको टालो और वहां से टलो। जो देह चाहे, तात्कालिक नेह चाहे उसको फ़ौरन मेह में बदल डालो। यही तत्व आवेगों का जन्मदाता है और यही अशांति का प्रदाता है। शादी से युवा समाज बच रहा है क्योंकि शादी को उन्मुक्तता में बाधक मान रहा है। फिल्मी गाने कहते हैं कि ज़िन्दगी पल दो पल, कौन करे प्यार, कौन करे इंतज़ार। ज़िन्दगी न मिलेगी दुबारा।

—हां, ऐस करौ! आनन्द करौ!!

—इस समय सरकारी कार्यालयों को छोड़ दें तो बाकी सारी कम्पनियां नौजवानों से भरी हुई हैं और प्रगति कर रही हैं, क्योंकि नौजवानों के पास जो सोच, समझ और कार्यक्षमता होती है वह अब घुटे-घुटाए अधेड़ लोगों के पास नहीं है। कार्मिक युवाओं में मैत्रियां होती हैं। मैत्रियों में खुलापन होता है। शील-अश्लील चुटकुलों का आदान-प्रदान होता है। वर्जनाएं-कुण्ठाएं समाप्त हुई हैं। पहले दुपट्टा भी छू जाए तो मौहल्ला हवादार हो जाता था। अब बच्चे हाथ मिलाते हैं। मैत्रीपूर्ण आलिंगन भी कर लेते हैं। कन्याएं खिलखिलाती हैं। अट्टाहस करती हैं। सबको अच्छी लगती हैं। कपड़ों में कमी आई है पर उनके दम में नहीं। नई पीढ़ी प्रेम करती है और अपने उतावलेपन के कारण उतनी ही शिद्दत के साथ घृणा के गर्त में भी गिरने-गिरने को हो जाती है। प्रेम प्रेम ही रहे, घृणा में तब्दील न हो, इसके लिए कौन समझाए चचा! वे ख़ुद सोचेंगे, तभी बदलेगा समाज। जैसे उन्होंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ सोचा तो समाज बदलने लगा न!

 

 


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