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    प्रभु जी! अरजी कहां लगाऊं?

    (भक्त की अरदास कि काम कैसे बने)

    प्रभु जी!

    अरजी कहां लगाऊं?

     

    हर खिड़की पर

    झिड़की पाई

    कैसे काम बनाऊं?

    कल आना कल आना,

    सुनि-सुनि

    मैं कैसे कल पाऊं?

     

    बेकल भयौ

    न कल जब आवै

    बरबस कलह बढ़ाऊं।

    कलह बढ़ै,

    पर काम न हौवै,

    सिर धुनि धुनि पछताऊं।

     

    खाय कसम

    अब रार न करिहौं

    पुनि-पुनि मिलिबे जाऊं।

    फाइन की

    लाइन में भगवन

    दिनभर धक्का खाऊं।

     

    साहब ने

    साहब ढिंग भेज्यौ,

    साहब के गुन गाऊं।

    गुन सुनि कै

    साहब नहिं रीझ्यौ,

    अब का जुगत लगाऊं?

    रिश्वत पंथ दिखायौ

    प्रभु जी,

    चरनन वारी जाऊं।

     

    प्रभु जी,

    अरजी पुन: लगाऊं,

    प्रभु जी,

    अरजी पुन: लगाऊं!

     

     

    wonderful comments!

    1. manorma mishra Sep 16, 2011 at 10:01 am

      bahut achchha likha hai our aaj ke samay me jo ho raha hai us per baht achchha vyang bhi....

    2. आनन्द विश्वास. Sep 26, 2011 at 6:54 am

      ऑफिस , फ़ाईल और बाबुओं के चक्कर काटते-काटते सारी उम्र कट जाती है . वर्तमान परिवेश का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया गया है. साधुवाद. आनन्द विश्वास. अहमदाबाद .

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