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  • धोबी का कुत्ता घर का न घाट का – podcast episode 3
  • मुहावरे न हों हमारी ज़िन्दगी में तो कहने वालों को आसानी न हो। जरा सी बात बड़ी हो जाती है और बड़ी सी बात को जरा सी बात में कह दिया जाता है। मेरी छोटी सी कविता में एक शब्द का भी इस्तेमाल किया है मैंने जिसके दो अर्थ हैं और जब ऐसा होता है तो कहते हैं कि श्लेष अलंकार होता है। अब अलंकार वलंकार में मत जाइए, ये देखिए कि घर पर धोबी के कुत्ते के साथ में क्या होता है और घाट पर क्या होता है…..।

    wonderful comments!

    1. Amit mehta Jul 27, 2012 at 9:04 am

      Kya shandaar tulna hai... Aap hamesha ki tareh Chaa gaye sir Ji

    2. gurmeet singh kalsi Jul 29, 2012 at 5:03 pm

      i like all of your work/poems/kavitas.

    3. अविनाश वाचस्‍पति Jul 29, 2012 at 5:07 pm

      लेकिन आज पॉडकास्‍ट का बन कास्‍टली हो गया है

    4. paramvir singh sawhney Aug 1, 2012 at 6:41 am

      only one word sir , khoob, two words more sir, bahut khoob......

    5. vijay Tyagi Aug 25, 2012 at 6:37 pm

      Guru ji, kya kahen,...jawaab nahi aapki baat ka, Aapke paas sagar hai,samaye hue jujbaat kaaa..... bahut ummdaa......

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