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ओ स्वयंनिर्मित स्वयंभू

o sawayannirmit sawayambhoo

 

 

 

 

 

 

 

 

ओ स्वयंनिर्मित स्वयंभू

(सभी आत्मालोचना करें तो कवि क्यों नहीं)

 

ओ कवि!

समझता तू रहा

ख़ुद को स्वयंभू।

सातवें आकाश की भी

आठवीं मंज़िल पहुंच

जो लिख दिया

सो ठीक मैंने लिख दिया

यह मानता अब तक रहा तू!

 

ओ स्वयंनिर्मित स्वयंभू!

छोड़ अपनी ठाठ की यह

आठवीं मंज़िल

उतर नीचे,

देख आगे देख पीछे।

 

इधर भी गर्दन घुमा

तू उधर का भी ले नज़ारा

और फिर से पढ़ उसे

जो लिख दिया है ढेर सारा।

बात उनसे कर

जिन्होंने पढ़ा उसको

सुना उसको

गुनगुनाया है उसे

या आचरण में गुना उसको।

 

वे निरीक्षक हैं

परीक्षक हैं

समीक्षक हैं।

पूछ उनसे

कहां तू हल्का हुआ था

उठ गया यूं ही हवा में

बेवजह लटका हुआ था।

 

ढ़ूंढ उनको

पढ़ रहे औ’ सुन रहे तुझको

निरंतर जो,

मिलें चाहे सड़क पर

या गली में या कि एअरपोर्ट हो।

 

 


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