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नामवर जी की चेतना चैतन्य है

नामवर जी की चेतना चैतन्य है

 

—चौं रे चम्पू! नामवर जी कौ असल जनम दिन कौन सौ ऐ रे?

—लेटेस्ट तो तीस जुलाई को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सभागार में नारायणी साहित्य अकादमी द्वारा मनाया गया था। दरसल नामवर जी हिन्दी आलोचना के ही नहीं हिन्दी के भी पर्यायवाची हो चुके हैं। जैसे हिन्दी दिवस चौदह सितम्बर को मनाया जाता है, लेकिन वह पूरे पखवाड़े पन्द्रह दिन तक चलता है, नामवर जी का जन्मदिन इस बार चला तीन महीने तक। सरकारी लेखे के अनुसार उनका जन्मदिन एक मई होता है और पत्रा-देखे के अनुसार अट्ठाइस जुलाई। नारायणी अकादमी ने दो दिन और बढ़ा दिए। इकत्तीस जुलाई को हंस के समारोह में भी लोग उन्हें जन्म-दिन की बधाई दे रहे थे। एक मई से इकत्तीस जुलाई तक तीन महीने की अवधि में शायद ही ऐसा कोई दिन गया होगा जिसमें किसी न किसी समारोह में नामवर जी की शिरकत न हुई हो और लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं न दी हों या दीर्घायु होने की कामना न की हो। जन्मदिन की तिमाही चली। नामवर जी ने बताया कि बचपन में पिताजी ने स्कूल में एक मई लिखवा दिया था।

—एक मई तो मजदूर दिवस होवै है लल्ला! उनके पिताजी ऊ कम्युनिस्ट हते का?

—ऐसा तो नहीं था शायद, पर तिथि का व्यक्तित्त्व पर फर्क ज़रूर पड़ता है। जो लोग दो अक्टूबर को पैदा होते हैं अनायास ही महात्मा गांधी से जुड़ जाते हैं। सब गांधीवादी हो जाएं ऐसा नहीं है फिर भी गांधी-दर्शन के कुछ छींटे उनके चिंतन-चर्म पर ज़रूर पड़ते हैं। हो सकता है नामवर जी के शासकीय जन्मदिन एक मई का भी उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा हो कि उनका चिंतन जनोन्मुखी हो गया। खूब निन्दाएं झेलीं, लेकिन निंदाओं ने ही उन्हें जिन्दा रखा क्योंकि संघर्ष का मूल-मंत्र और अपने चेहरे की मुस्कान उन्होंने जाने नहीं दीं। ख़ैर कुछ भी हो, इस उम्र में भी नामवर जी की चेतना चैतन्य है और चाल मत्तगयन्द छंद की तरह लासानी है। वे जिधर निकलते हैं, उनके लिए कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास सब रास्ता छोड़ देते हैं और आदर भाव से देखते हैं कि उनकी नज़र हम विधाओं पर पड़ जाए।

—उनकी कोई किताब पढ़ी भलेई न होय पर नामवर कौ नाम हर कोई हिन्दी वारौ जानैं।

—भला हो दूरदर्शन के मुकेश कुमार का जिन्होंने अपने गुरु नामवर सिंह जी को जन-जन में लोकप्रिय करा दिया, अन्यथा उन्हें वही लोग जानते थे जिनका साहित्य और आलोचना से सरोकार रहता था। नामवर जी ने दूरदर्शन पर पुस्तक-समीक्षा शुरू करी और एक प्रकार से साहित्य-समीक्षा विषयक जन-शिक्षा हुई। न जाने कितनी पुस्तकें उनकी समीक्षा के बाद अधिक पाठकों को प्राप्त हुईं। न जाने कितने लेखक उनकी विवेचनाओं से महत्त्व पा गए। काश वह कार्यक्रम चलता रहता तो नामवर जी के मुख से हम बहुत सारी पुस्तकों का विवेचन सुनते रह सकते थे।

—और खूबी बता उनकी।

—चचा वे पढ़ते खूब हैं। प्रतिदिन पढ़ने के लिए तीन-चार घंटे निकालते हैं। विद्यार्थियों के लिए सदैव उपलब्ध रहते हैं। लोगों की शिकायत रहती है कि उन्होंने लिखना बन्द कर दिया है। सो क्या फर्क पड़ता है। तुम्हारा चम्पू भी तो लिखने में महाप्रमादी है, बुलवा लो उससे चाहे जितना। वाचिक परम्परा का चम्पू है तुम्हारा। नामवर जी वाचिक परम्परा के आलोचक हैं। वे जो बोलते हैं सो लिखे से कम नहीं होता। सरल शब्दों में, उदाहरणों के साथ, जातक कथाओं और शेरो-शायरी को जोड़ते हुए आलोचना को बड़ी रसमयी बना देते हैं। समीक्षा सिर्फ रस्मी होकर नहीं रह जाती। जब तुम्हारा चम्पू जामिआ मिल्लिआ इस्लामिया में हिन्दी विभाग का अध्यक्ष हुआ करता था, नामवर जी एक पुकार पर चले आते थे।

–अब कित्ते साल के है गए?

–अगर सन छब्बीस का जन्म मानो तो पिचासी पूरे कर लिए। सत्ताइस का मानो तो पिचासीवें में चल रहे हैं, बाकी विद्वान की क्या उम्र! विद्वान सदैव युवा रहता है, क्योंकि उसका सोच समाज को सुदूर भविष्य का रास्ता दिखाता है चचा।

 


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