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न कोई सचिव न अध्यक्ष

न कोई सचिव न अध्यक्ष

 

—चौं रे चम्पू! जे बता कै अजमेर के कविसम्मेलन की का ख़ासियत ई?

—ख़ासियत बताने से पहले ये बताना चाहता हूं कि जैसे हर सांस्कृतिक गतिविधि, कलाएं और उत्सव समय के साथ अपना रूप बदल रहे हैं, वैसे ही कविसम्मेलनों ने भी अपना रूप बदला है। पहले परम्परा थी कि कविसम्मेलन रात के दस बजे प्रारम्भ होते थे और चलते थे भोर की किरण तक। तीन दौर होते थे। कवि सुनाने से नहीं थकते थे, क्योंकि सुनने वाले भोर तलक बैठे रहते थे। धीरे-धीरे हुआ ऐसा कि दूसरे दौर में आधी जनता बचती थी, तीसरे दौर में चौथाई से भी कम। आयोजकों ने सोचा तीन से दो दौर कर दो। तुम्हारे चम्पू ने वो भी किए। तदनंतर…

—तदनंतर का भयौ?

—संचार माध्यमों और टेलीविजन के अपार चैनलों के आने के बाद ऐसा होने लगा कि दो दौर के कविसम्मेलनों का एक ही दौर में ही काम चलने लगा। अच्छा भी हुआ, बुरा भी हुआ।

—बुरौ कैसै भयौ?

—कवि को मालूम है कि दूसरा दौर तो आना नहीं है। ज़माने के सामने स्वयं को जमाने के लिए उसके पास जितनी भी सामग्री है, एक ही बार में ठेलने लगा। नए कवि इतना समय खाने लगे कि तथाकथित वरिष्ठ कवियों के लिए समय ही नहीं बचता था। वे तिलमिला कर रह जाते थे। सद्भाव और सौमनस्य दिखाने की अपनी मजबूरी और अपने स्वभाव के कारण नयों का कोई विरोध नहीं करते थे। ग़नीमत है कि तब तक मंच पर कविता होती थी। पिछले सात-आठ साल में गिरावट की गति तेज़ हो गई। नाजायज फ़ायदा उठाया इन नए कवियों ने कि कविताएं सुनाने के बजाए थोक मेंलतीफे सुनाने लगे। फिर तो ऐसा मन होता था चचा कि ये मंच फट जाए और हम उसमें समा जाएं। क्या सड़े-गले लतीफे सुनने के लिए यहां बैठे हुए हैं। अस्सी प्रतिशत लतीफे सुनाने के बाद कवि एक छवि-सुधारू कविता सुनाता था।

—लतीफा तौ पैलै ऊ होते रए ऐं, नई का बात ऐ?

—पहले यह अधिकार केवल संचालक के पास होता था।

—चल तू अजमेर की बता!

—एक दौर का कविसम्मेलन अजमेर में अब निश्चित समय का शो बन गया। मुझे अच्छा लगा। निमंत्रण-पत्र पर लिखा था, ‘आनन्दम’ सृजन को समर्पित संस्था। कार्यक्रम आपका है। नियत अवधि का है। इसकी गरिमा हेतु आपसे अपेक्षा है कि समय से पन्द्रह मिनट पूर्व अपना स्थान ग्रहण कर लें। कार्यक्रम के दौरान आवागमन एवं प्रस्थान न करें। आठ वर्ष से कम उम्र के बच्चों को न लाएं। अपने मोइबाइल फोन को स्विच ऑफ या कम्पन मोड पर रखें। प्रथम आगत, प्रथम स्वागत के आधार पर स्थान ग्रहण करें। कार्यक्रम सात बजे प्रारम्भ होकर ठीक साढ़े नौ बजे समाप्त हो जाएगा।’ चचा!इस कविसम्मेलन की खूबी यही थी कि सात बजे से पांच मिनिट पहले कवियों को मंच पर बिठा कर सही समय पर समय पर्दा खोल दिया गया। हमने देखा कि हॉल फुल। न कोई मुख्य अतिथि, नकोई भाषण। एक छोटी बच्ची ने दीप जलाया। चार कवि थे। सब मुझसे उम्र में छोटे। पाबंदी यह भी लगा दी गई थी कि कोई लतीफा नहीं होगा। मैं सुकून में था कि कवि चुटकुले नहीं कविताएं ही सुनाएंगे तो समय ज़्यादा नहीं लगाएंगे। इटावा के कमलेश शर्मा और रायपुर के डॉ. सुरेन्द्र दुबे ने शानदार काव्यपाठ किया। रासबिहारी गौड़ ने कुछ लतीफ़े ज़रूर सुनाए लेकिन उनकी कविताएं पसन्द की गईं। वे वहां के स्थानीय और लोकप्रिय कवि हैं और ‘आनन्दम’ संस्था के संस्थापकों में से एक हैं।

—तौ संस्थापक नै नियम तोड़ौ?

—नहीं! संचालक होने के नाते उन्हें छूट थी। ’आनन्दम’ के कुल बीस संस्थापक सदस्य हैं। न कोई सचिव है, न अध्यक्ष। बीस के बीस पदाधिकारी हैं। वही मंच की व्यवस्था कराते हैं, वही श्रोताओं के लिए वॉलेंटियर्स बन जाते हैं। बीस के बीस आवभगत करने वाले भगत। हर सदस्य को पचास कार्ड दिए जाते हैं। हज़ार का हॉल आराम से भर जाता है। बहुत दिन बाद मुझे इस आनन्दमकविसम्मेलन में आनन्द आया। मेरे लिए पूरा एक घंटा रखा हुआ था और चचा मुझे पता ही नहीं चला कि एक घंटा कैसे बीत गया।

 


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