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न दुखने वाला दिल कौन रखता है

na dukhane vaalaa dil kaun rakhataa hai

 

 

 

 

 

 

 

 

न दुखने वाला दिल कौन रखता है

(मध्यवर्गीय पुरुष की ओर से नारी के लिए और सुनिए)

 

हम दोनों के पास

एक एक दिमाग़

और एक-एक दिल है,

इन्हीं दोनों की तो सारी ड्रिल है।

 

दिमाग है!

उसकी पहचान ये कि ज़हीन-जाहिल है,

कभी कामकाजी, कभी काहिल है।

 

दिल है!

उसकी पहचान ये कि वो दुखता है,

बता! न दुखने वाला दिल

कौन रखता है?

 

ज़रूरत है एक दिमागात्मक दिल

और दिलात्मक दिमाग की,

उसमें आग की नहीं स्नेहानुराग की।

 

इसलिए हे देश की कन्या,

धरा-धानी, धवल-धन्या!

पुरुष भी तो इसी परिवेश का है,

जहां रहती है तू, उस देश का है।

जहां की एक संस्कृति है पुरानी,

पिया जिसने कई घाटों का पानी।

 

भला है जो बराबर का बताती,

तू जितने काम करती

और फ़र्जों को निभाती,

तेरे समतुल्य क्षमता ही कहां है?

तेरी निष्ठा व ममता ही कहां है?

 

ऋणी जितना रहा

उतना नहीं कृतज्ञ हूं मैं,

निभाने में ज़रा अल्पज्ञ हूं मैं।

 

तू अधुनातन मनोबल हो रही है,

कई अर्थों में लोकल हूं अभी तक

मगर तू सतत ग्लोबल हो रही है!

 


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  1. मज़ा आ गया जनाब।

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