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न चाहते हुए भी इकसठ के हो गए

न चाहते हुए भी इकसठ के हो गए

 

—चौं रे चम्पू! आज तौ तेरौ जनमदिन ऐ, कैसे मनायगौ?

—चचा, मैं इस बार अपना जन्मदिन सिर्फ़ घर के सदस्यों के साथ मनाना चाहता हूं। मेरे भाई आएं, उनकी बहुएं आएं, उनके बच्चे आएं, मेरी मां रहे साथ में।

—और सुसराल वारेन कूं नायं बुलायगौ का?

—नहीं नहीं, वे भी आएं, वे परिवार के अंग हैं। जकार्ता में बैठा मेरा दोस्त राकेश कहता है कि हर वर्षगांठ पर केक छोटा होता जा रहा है और मोमबत्तियां बढ़ती जा रही हैं।

—केक के पैसा मोते लै लै! तू जे बता कै इकसठ साल कौ है जायगौ न?

—चचा, पिछले साल जब मैं साठ का हुआ था, तो मैंने संकल्प लिया था कि मैं ताउम्र इकसठ का नहीं होऊंगा, लेकिन कमबख़्त हो गया। सोचाई वही है जो साठ का होने पर आई थी। लोग समझते हैं कि इस उम्र का इंसान चुका हुआ होता है, लेकिन वह चुका हुआ तो नहीं ही होता, हालांकिआवश्यकताओं से अधिक सब कुछ कर चुका होता है। उम्र के खेत में काफ़ी मेहनत बो चुका होता है। बोई हुई फसलों से काफ़ी कुछ पाता है। पाने पर मज़ा आता है। ख़ूब वज़न ढो चुका होता है, थक कर खूब सो चुका होता है। सबके सामने मुस्कुराता है, लेकिन अकेले में कई बार रो चुका होता है।

—रोइबे की का बात? दिक्कत का आमैं जा उमर पै?

—जो तुम्हें आई होंगी चचा!

—ना, हमें कोई दिक्कत नायं आई! हम तौ बगीची पै अलेल रहिबे वारे प्रानी ऐं लल्ला। जे दिक्कतबाजी तौ सहर कौ मरज ऐ।

—हां चचा! गांव-क़स्बे में इस तरह की दिक़्क़तें नहीं आतीं। शहर में इस उम्र पर आकर नसीहत देने के बाद बन्दा आहत होता है।

इनायत की आयतें बेमानी हो जाती हैं। फिर वह शिकायतों को पीना सीखता है, क्योंकि अब आकर वह भरपूर जीना चाहता है। अपनी कामनाओं में बेहद सच्चा होताहै। और चचा! असल बात ये कि फिर से बच्चा होता है। तरह-तरह के झटके झेल चुका होता है। ख़तरों से खेल चुका होता है। ज़माने से मान-सम्मान पाता है, तब कहीं ये ज्ञान पाता है कि उसे कुछ भी नहीं आता है। सबके लिए रास्ता साफ़ करता है, दुष्टों को हृदय से माफ़ करता है। उसे पेड़-पौधे,दारू पिए औंधे, सब बच्चे नज़र आते हैं। उसे सब घड़े कच्चे नज़र आते हैं। वह उन्हें बड़े प्यार से ठोकता है ताकि टूट न जाएं। वह उन्हें पकाना चाहता है। वह घर की खिचड़ी में पड़ी मूंग की दाल की तरह घुल जाता है, पर किसी की छाती पर मूंग दलना नहीं चाहता। वह दूसरों के लिए झरनाहोता है, पर खुद झरना नहीं चाहता। वह कुछ भी ऐसा-वैसा करके मरना नहीं चाहता।

—लल्ला, मरिबे की का चलाई। इकसठ की उमर में सोलह कौ महसूस कर। तेरी बातन ते निरासा की गंध आय रई ऐ।

—नहीं चचा नहीं, निराशा नहीं है। तुम बड़े हो, तुमसे क्या कहूं। इस उम्र का आदमी अपना दिल हमउम्रों के साथ भी मुश्किल से खोलता है। देखिए, जी तो उसका भी डोलता है। चाय में उतनी ही चीनी डालता है, जितना कि उसका शरीर घोलता है। ये नन्हा राजू, वक्त की तराजू होता है। सचउसके आजू-बाजू होता है। चचा, जवानी तो जीवन की गलियों में एक खोया हुआ मोती है। ये बात मेरी नहीं है, एक दोहा सुना था, ‘झुकी कमर की डोकरी, का ढूंढत मग जाहि? जोबन मोती इन गलिन, खोयौ ढूंढत ताहि।’ ग़नीमत है कि अपनी कमर झुकी नहीं है और जीवन भी भरपूर सा लगताहै। आजकल साठ-इकसठ साल का आदमी कोई लाश नहीं होता, एक तलाश होता है, उस दुकान की, जहां से उम्र ख़रीदी जा सकती हो। विडम्बना ये है कि वह अपने आपको तेज़ दौड़ने वाली कार का टायर समझता है, लेकिन ज़माना उसे रिटायर समझता है।

—फिर निरासा में आय गयौ तू!

—चचा, ये उम्र ही आशा और निराशा का लक्ष्मण-झूला है। पंगाखोर हो तो लक्ष्मण रेखाएं परिवार के लिए ज़्यादा खींचता है। भविष्यवादी हो तो सारी नकारात्मक चीज़ों की तरफ से आंख मींचता है।

—खैर हमाऔ सेर सुनि लै, ‘जित्ते पतझर देखि चुक्यौ ऐ, देखै दुगने और बसंत। जीबन की या फुलवारी में, ऋतुअन कौ हो कबहुं न अंत।’ जीतौ रह प्यारे!

 


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