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मूंछें गिरती रहीं वह गाता रहा

मूंछें गिरती रहीं वह गाता रहा

 

—चौं रे चम्पू! नजर ई नायं आवै! किन गतिबिधीन में लगौ भयौ ऐ तू आजकल्ल?

—चचा, नवम्बर महीने में तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झड़ी लग जाती है और इन दिनों टोटा पड़ जाता है लाइट और साउंड वालों का। पिछले दिनों हिन्दी अकादमी ने ढेर सारे कार्यक्रम कराए। पुराने लोग भी दगा देने की हालत में आ गए। जी, यहां जाना है, जी, वहां जाना है, पर परिचयदास जी कुशल सचिव हैं, उन्होंने लाइट और साउंड वालों को बांधकर और पिछले सप्ताह हर इन कार्यक्रम कराए। राजनारायण बिसारिया द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक ‘हिन्दी काव्य परम्परा’ सराहा गया। उन्होंने नृत्य, नाट्य और ध्वनि प्रकाश व्यवस्था से हिन्दी कविता की अब तक की कहानी श्रोताओं के सामने प्रस्तुत कर दी। फिर जी, भानुभारती का नाटक ’तमाशा न हुआ’ हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर को फिर से सोचने-समझने की एक बहस थी, यह नाटक। नाटक के अन्दर नाटक था और इस तथ्य को रेखांकित करता था कि पुराने महान साहित्यकारों को यदि नए नजरिए से देखा जाए, तो क्या मायने निकलते हैं। अपने मनुष्यतावादी सोच से टैगोर ने जिस ‘मुक्तधारा’ की वकालत की थी, उसकी ज़रूरत आज ज़्यादा महसूस की जा रही है, विचारधाराओं की घटाटोप में।

—तौ बिचारधारान कौ का घटाटोप ऐ?

—चचा घटना-घटित घटाएं छाई हुई हैं। लोग भूमण्डलीकरण का टोप लगाए हुए हैं, समस्याओं में उलझे हुए हैं। गहराई में जाते नहीं हैं, ऊपर-ऊपर ही मूल्यांकन करते हैं। लक्ष्मी नारायण मिश्र का नाटक ‘सिन्दूर की होली’ हेमंत मिश्र ने निर्देशित किया। ये समाप्त हुआ तो ग्यारह तारीख़ से लोकबिम्ब, लोकनाट्य उत्सव, नौटंकी का आयोजन किया गया। कानपुर शैली की नौटंकी ‘डाकू सुल्ताना’ हुई, हाथरस शैली की नौटंकी ‘भक्त पूरनमल’ कृष्णा कुमारी ने प्रस्तुत की। हाथरस शैली की ही एक नौटंकी मोहन स्वरूप भाटिया ने ’सत्यवादी हरीशचन्द्र’ प्रस्तुत की और नाट्य बिम्ब उत्सव की अंतिम नौटंकी थी ‘भरथरी’।

—जे बता लल्ला कै आधुनिक नाटकन और लोक नाटकन में का फरक ऐ!

—ये तो तुमने लम्बी बहस का मुद्दा उछाल दिया चचा! पर इतना है कि लोक-नाट्य अपनी गायकी और शारीरिक क्षमता की प्रतिभा पर टिके होते हैं। उन्हें मंच सज्जा, कॉस्ट्यूम और रंग-मंच के नियमों की ख़ास परवाह नहीं होती।

—उदाहरन दै कै समझा।

—अब चचा, मैं आपको क्या बताऊं। गाते-गाते राजा ’भरथरी’ के नकली बाल और मुकुट हिल रहे थे, गायकी में परेशानी दे रहे थे। कलाकार ने आव देखा न ताव बाल और मुकुट उतार कर फेंक दिए और अपने मूल स्वरूप में आकर गायकी का कौशल दिखाने लगा। लोगों को थोड़ी सी हंसी आई, लेकिन जैसे ही वे गायकी में बंधे तो भूल गए कि बाल उतर जाने से या मुकुट उतर जाने से कोई फर्क पड़ा। गुरु गोरखनाथ आए नकली सफेद मूंछ और दाढ़ी लगा के। अच्छे गायक। डोरी से बनी बहुत मामूली मूंछ-दाढ़ी थीं।  गाएं और मूंछ सरक-सरक कर उनके होठों तक आ जाएं। गायकी में व्यवधान पड़े। आधा ध्यान उनका मूंछ को पकड़े रहने में था आधा ध्यान गायकी पर। बिना बात ही हास्य उत्पन्न हो रहा था, लेकिन कलाकार ने हार नहीं मानी। मूंछों ने भी हार नहीं मानी। वे गिरती रहीं, वो गाता रहा। पिंगला का अभिनय करने वाली उषा देवी को, गायक निषाद जो भर्तृहरि का रोल कर रहे थे, उन्होंने कस-कस कर ऐसे कोड़े मारे कि कोड़े की नोक उनकी आंख में लग गई। आंख लाल हो गई और आंसू बहने लगे, लेकिन फिर भी उषा देवी पिंगला गाती रही। कुल्टा पिंगला को कोड़े मारने के बाद भर्तृहरि ने अपनी छाती पीटी। छाती पीटते ही कॉर्डलैस माइक का लेपल नीचे नाड़े की तरह लटक गया। पूरे नाटक के दौरान भर्तृहरि ने वह लेपल माइक ठीक नहीं किया। अंत तक लटकता ही रहा। आवाज में इतना दम कि बिना लेपल के उसके लेवल में कहीं कोई कमी नहीं आई। गोरखनाथ फूंक मार-मार के मूंछों को ऊंचा करते रहे और गाते रहे। अभी कल एक नाटक हुआ मुक्तिबोध की कविताओं पर आधारित ‘स्याह चन्द्र का फ़्यूज़ बल्ब’ बड़ा अच्छा रहा। लोगों ने सराहना की और रॉबिन दास के नाट्य कौशल को पसंद किया और एक बात जानकर आपको खुशी होगी।

—वो का?

—इसका आलेख तुम्हारे चम्पू ने तैयार किया था।

 

 


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