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    मेरी दिल्ली से पहली दो मुलाक़ातें

     

    —चौं रे चम्पू! राजधानी दिल्ली सौ साल की है गई! तैनैं दिल्ली कब ते देखी?

    —चचा, दिल्ली के पचास सालों का अपना अनुभववादी इतिहास तो मैं भी बता सकता हूं। सन इकसठ में पहली बार दिल्ली आया था।

     

    jama masjid

     

     

     

     

     

     

     

     

    —चल तू अपनी ई सुना। पहली बार कैसे आनौ भयौ?

    —बचपन की छुट्टियां या तो ननिहाल इगलास में बीतती थीं या फिर मेरठ में ताऊजी डॉ. कृष्ण चन्द्र शर्मा के घर। दिल्ली पहली बार बड़ी जीजी मीना और मदन भैया के साथ मेरठ से आया था। वेगोलचा में सिनेमा दिखाने लाए थे। गोलचा सिनेमा नया-नया सुसज्जित हुआ था। सीढ़ियों पर मखमल लगी थी और अगल-बगल जगर-मगर बिजलियां। मुझे लगा जैसे स्वर्गलोक की सीढ़ियां चढरहा हूं। वहां देखी अपने जीवन की पहली फिल्म ‘साहिब, बीबी और गुलाम’। उम्र इतनी बड़ी नहीं थी कि मैं गुरुदत्त के मौन प्रेम और मीनाकुमारी के दर्द को समझ पाता, लेकिन पता नहीं क्यों वह फिल्म मुझे अच्छी लगी। शायद इसलिए कि उसी ने मुझे दस साल की उम्र में वयस्क झंकृति से भर दिया। परीकथाओं के भूतों से ये प्रेमी भूतनाथ भिन्न था।

    मेरठ लौटे तो ताऊ जी के साथ संवाद हुआ। उन्होंने पूछा कि फिल्म में क्या अच्छा लगा? पता नहीं मैंने उन्हें क्या बताया, लेकिन इतना याद है कि उन्होंने ताई जी से कहा था कि देखो तो सही कैसे बड़े-बूढ़ों की तरह बात करता है। मुझेफिल्म का एक-एक दृश्य याद था। रामवाटिका हवेली के प्रांगण में मैंने उसकी कहानी अपने हमउम्र बालकों को रस ले लेकर सुनाई। एक-एक दृश्य का अभिनय करके दिखाया। एकल अभिनय किया करता उस ज़माने में और बाल-मण्डली का प्रिय नायक बन जाता था। फिर अगले वर्ष आया पिताजी के साथ। उनका ’ब्रजमाधुरी’ नामक आकाशवाणी के कार्यक्रम में काव्य-पाठ था। स्टूडियोकी रिकॉर्डिंग में मैं चुपचाप बैठा हुआ लकड़ी की एक अलग तरह की महक ले रहा था। छत और दीवारों पर लगी हुई छेददार लकड़ियों से वह गंध बरस रही थी। पिताजी रिकॉर्डिंग के बाद ख़ुर्जालौट गए थे और मैं एक सप्ताह के लिए अपने पिता के मित्र, ‘ब्रजमाधुरी’ कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता, रामनारायण अग्रवाल भैयाजी के घर रुक गया।

    पुरानी दिल्ली के किसी वालान में उनका घर भीकिसी तिलिस्मी हवेली से कम नहीं था।

    सीढ़ियों पर रस्सी पकड़कर चढ़ते थे और चढ़ते ही चले जाते थे।

    उस रस्सी से पसीने की महक आती थी। हर मंज़िल पर लोहे के जाल। ख़ूब सारे किरायेदाररहते थे उस हवेली में।

    भैया जी को सब प्रणाम करते थे। उनकी पत्नी लोक-गायिका थीं। वे रियाज़ करती थीं तो उस हवेली में शायद सबसे सुखी प्राणी मैं ही होता था। वे गेहुंए रंग की पतली छरहरीलम्बी और आकर्षक महिला थीं। बाल भी लम्बे-लम्बे थे, जिनसे आंवले के तेल की भीनी-भीनी खुश्बू आती रहती थी। रंग-बिरंगे फूलों की महक बाल-भवन में मिली जहां मैं भैयाजी के पुत्र मुन्ना केसाथ गया था। डॉल्स-म्यूजियम में फिनाइल की महक बड़ी भाई थी।

    —हर चीज की महक ई लई तैनैं?

    —नहीं चचा, हर ज्ञानेन्द्रिय चौंकन्नी थी। गोलचा के किनारे बनी एक दुकान में पहली बार छोले-भठूरे खाए थे। कुल्फी-फालूदा भी। ख़ुर्जा में खुरचन और बर्फ मलाई मिलती थी, लेकिन फालूदा सेपहली बार मुलाक़ात हुई। मुन्ना के साथ वहां से पैदल-पैदल जामा-मस्जिद तक गए। उस  इलाक़े में मछलियों की दुर्गन्ध से मैं परेशान हो उठा था, लेकिन थोड़ा आगे चलकर उर्दू बाजार में किताबोंकी महक ने राहत दी। चितली क़बर के बाजार की तरह-तरह की गंध भी मेरे लिए नई थीं। मुस्लिम संस्कृति से पहली बार इस स्तर पर रूबरू हो रहा था। ख़ूब ज़ोर की प्यास लगी तो भिश्ती कीचषक से छन-छन करते सिल्वर के कटोरे में मैंने मुन्ना के मना करने के बावजूद ठण्डा-ठण्डा पानी पिया था। मुन्ना ने कहा, ये कटोरे को धोते नहीं हैं, मैं तो नहीं पीता चमड़े का पानी। मैं किसीवयस्क की तरह मुस्कुराया था, लेकिन थोड़ी देर बाद बाहर आकर जब डण्डी में लगी चुस्की का रस कमीज़ों पर गिराया तो फिर से बच्चे हो गए।

    —ख़ूब मजे किए तैनैं! आगै सुना।

    —चचा, अभी तो कहीं जाना है, अगली बार सुनाऊंगा दिल्ली-गाथा, आगे और क्या-क्या हुआ था।

     

    wonderful comments!

    1. neeraj kaushik दिसम्बर 23, 2011 at 4:52 अपराह्न

      sir,iksath ka janam h,golcha,jagat, delite,moti ityadi ki khushbuyon ka shaidayee hu.achchha laga ki apko bhi ye khubooywn yaad h.

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