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मेरे गुलदस्ते के आधे-आधे फूल

मेरे गुलदस्ते के आधे-आधे फूल

 

—चौं रे चम्पू! आज आगै की दिल्ली-गाथा सुनायगौ का?

—चचा, दिल्ली की बात बाद में, पहले एक चमत्कारी सा लगने वाला वाकया आपको बताता हूं।

—बता।

—रविवार की सुबह-सुबह श्री उदयप्रताप जी का फोन आया। मैं सो रहा था। आधी नींद में फोन उठाया। इससे पहले कि वे बोलें, मैंने उनसे कहा, चचा, मालूम है अदम गोंडवी नहीं रहे। वे बोले, अरे तुम्हें कैसे पता चला! और मैं जागृत अवस्था में आते हुए सोचने लगा,

अरे हां, मुझे किसने बताया कि अदम गोंडवी नहीं रहे। मैंसपना देख रहा था।

मैंने कहा, सपने में देखा चचा। वे बोले हां, अभी सुबह पांच बजे उनका देहांत हुआ है। लगभग उसी समय मैं सपना देख रहा था। दरसल, दिन मेंजो चिंताएं रहती हैं, वे सपने में अवचेतन के रास्ते निकलकर आती हैं!

लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में तीन दिन पहले तक मेरी उनसे बातें होती रहीं। उनकीवाणी में ज़रा सी निराशा नहीं थी। ख़ुद्दारी और जिजीविषा भरपूर थी, लेकिन बातचीत में कुछ ऐसा था जो कह रहा था कि उनका शरीर अब उनकी आत्मिक ताक़तका साथ नहीं दे पा रहा।

—मोय तौ दोनों के दोनों भौत अच्छे लगते ए लल्ला।

—मैं भी इन दोनों से बहुत गहरा जुड़ाव महसूस करता रहा हूं। मेरठ के भारत भूषण जी सन बासठ में मेरे स्वर्गीय पिता के बुलावे पर ख़ुर्जा के एस.एम.जे.ई.सी. इंटरकॉलेज कविसम्मेलन में आए थे। मैं बचपन में मंच के कवियों की प्रस्तुति-शैलियों की ज्यों-की-त्यों नकल करने में आनन्द लिया करता था। भारत जी का तब कासुना हुआ गीत मुझे आज भी याद है, ‘मैं हूं बनफूल, भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुरझाना? मैं भी उनमें ही हूं जिनका, जैसा आना वैसा जाना।’

सचमुच जंगल मेंखिलने वाले फूल की तरह वे खिले और लगभग अनजाने से चले गए। उन्हें वे ही जानते हैं जिन्होंने उनको साक्षात सुना या कविता के जंगल में बनफूलों की तलाशमें भटके। कविसम्मेलनों के गुलदस्तों में सजने वाले कवि वे प्रायः नहीं रहे। वे अपनी संवेदनशीलता को बेचने के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने एक अपराधबोध के साथकहा भी, ‘मैं गीत बेचकर घर आया, सीमेंट, ईंट गारा लाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना।’

गीतों में सार्थकता तलाशने के दौरान एक अधूरापन महसूस करते हुए वे ख़ुदसे सवाल करते थे, ‘आधी उमर करके धुंआ, यह तो कहो किसके हुए? परिवार के, या प्यार के, या गीत के, या देश के?’

विसंगतियां उनकी ज़िन्दगी में काव्य-चेतनाके द्वार पर आकर बार-बार रोती थीं, ’बांह में है और कोई, चाह में है और कोई।’ उनके गीतों में प्रणय का एक विवेकजन्य अवसाद दिखाई देता था। मैं समझता हूंकि वे स्वयं एक ऐसा गीत थे जिसने मानव शरीर धारण किया था।

—और अदम गोंडवी के बारे में का कहैगौ?

—एक मामले में तो अदम जी भी कविसम्मेलनों में जाने के बावजूद उनसे निरपेक्ष रहते थे, लेकिन आजीविका के लिए कुछ तो चाहिए। भारत जी मन के अन्दर कीदुनिया की विसंगतियों के कवि थे और अदम जी बाहर की दुनिया की सामाजिक विसंगतियों के कवि। दोनों ही कवि वाचिक परम्परा के समर्थ कवि होने के बावजूदकविसम्मेलन के आर्थिक रोगाणुओं से ग्रस्त नहीं थे। अदम गोंडवी जी के साथ प्रगतिशील सम्मेलनों में, प्रगतिवादी काव्यगोष्ठियों में ख़ूब उठना-बैठना होता रहा। उनकी‘काजू भुनी प्लेट में, व्हिस्की गिलास में’ जैसी ग़ज़लें आज भी कविसम्मेलनों के संचालक इस्तेमाल करते हैं। अदम जी ग़रीब भारत की नुमाइंदगी करते हुए सवालकरते थे, ‘जो उलझकर रह गई है, फाइलों के जाल में, गांव तक वह रौशनी, आएगी कितने साल में?’

सच बताऊं चचा वाचिक परम्परा का एक सिपाही होने केबावजूद मैं भी कभी-कभी व्यथित रहता हूं।

—काय बात की ब्यथा?

—मेरी एक ग़ज़ल का पहला शेर है, ‘क्या बतलाऊं सुविधाओं में कैसे-कैसे ज़िन्दा हूं, गुलदस्ते में फूल सजा कर फूलों से शर्मिन्दा हूं।’ कविसम्मेलनों में श्रोताओं सेसीधे जुड़ने का जो सुख है वह तो अलौकिक आनन्द देता है लेकिन कई बार बढ़ती

हुई स्तरहीनता और व्यवसायिकता दुखी करती है। बहरहाल, आज मेरे गर्वीलेगुलदस्ते में जितने भी फूल हैं,

आधे चढ़ाता हूं अपनी किशोरावस्था के प्रिय एकांतिक गीतकार भारत भूषण को और आधे चढ़ाता हूं

अपनी जवानी से साथी रहेक्रांतिधर्मी अदम गोंडवी को।

 


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