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मीठा जल कहां रहता है

मीठा जल कहां रहता है

 

—चौं रे चम्पू! आजकल्ल भौत लोकार्पन करत घूम रह्यौ ऐ! आनन्द आवै तोय जा काम में?

—हर बार तो नहीं, कभी-कभी आता है, लेकिन इस कारण कि मैं किसी पद पर हूं, मुझे महत्व दिया जाय, ज़्यादा आनन्द नहीं आता। अच्छा सुनने को मिले तो अच्छी प्रतिक्रिया देने का मन करता है। शशिकांत के ग़ज़ल-संकलन ‘सफ़र में हूं’ का लोकार्पण हुआ। संचालक अलका सिन्हा और अन्य वक्ताओं ने पुस्तक के आधे से ज़्यादा शेर तो अपने वक्तव्यों में ही सुना दिए और मैंने पाया कि शशिकांत की ग़ज़ल-कहन में एक साधनार्जित सादगी थी। पुस्तक प्रकृतिप्रदत्त मनुष्य और मनुष्य की प्रकृति के सफ़र की अच्छी सफ़ारी थी। बहरहाल, शेर बहर में थे और हाल भरा हुआ था।

—तोय सब्दन की टांग तोड़े बिना मजा नायं आवै रे! कोई सेर सुना।

—एक शेर है, ‘हम दरिया थे, सागर में मिलकर नाहक, अपना मीठा जल भी ख़ारा कर बैठे।’ अब इसका अपने हिसाब और अपनी सुविधा से मतलब निकाल लो। हर श्रोता-पाठक को अपने तजुर्बों के आधार पर यह शेर अपनी हक़ीक़त लगेगा। यही अच्छे शेर का गुण होता है।

—तैनैं का मतलब निकारौ?

—सीधी सी बात है, बड़े उद्देश्य को पाना चाहते हो, व्यापक-विस्तृत क्षितिज छूना चाहते हो या कुछ भी विराट करना चाहते हो तो खारापन तो नसीब में आएगा ही। जब तक नदी थे, तभी तक मीठे थे। जैसे ही नदीदे हुए, सागर से मिले, बड़े हो गए, ज़्यादा ऊंची लहरें हो गईं, लेकिन ख़ारे तो हो ही गए। लक्ष्य-प्राप्ति पर चेतना मुग्धा तो होगी पर व्यक्तित्वांतरण पर हो सकता है पछताओ! क्या बात है चचा! शेर सुनकर मज़ा आ गया, लेकिन मैं एक बात और सोचता हूं….

—बता, बता, रुकै मती!

—मैं ये सोचता हूं कि नदी में भी मीठा जल कहां रहता है! प्रदूषण के बाद नदियों में पेय जल है कहां? अगर है भी तो वह किनारों पर नहीं मिलता। नदी के दोनों कूल अपनी तात्कालिक अनुकूलता के चक्कर में प्रतिकूल हो जाते हैं। दोनों के दोनों कूल प्रतिकूल। मनुष्य-विरोधी तत्व किनारे पर किलोल करते हैं, शुद्ध जल वहां मिलता नहीं है। मैंने आपको बताया था न, बचपन में जब मैं अपने नाना जी के साथ गर्मियों की छुट्टियों में कर्णवास-राजघाट जाया करता था तो मीठा और शुद्ध जल लाने के लिए, घड़े को तैरने का सहायक उपकरण बनाते हुए मध्य जलधारा तक जाते थे, घड़ा भर कर लाते थे। प्रतिकूल स्थितियों में अनुकूल मीठा जल कूल-किनारे लगा देते थे। मीठा जल दो किनारों के बीच में होता है। अब मैं एक बात और सोच रहा हूं।

—वो बात ऊ बताय दै!

—चचा, शेर में दो मिसरे होते हैं, दोहे में दो पंक्तियां। शेर और दोहा दोनों अपने आप में पूर्ण। दोनों की दो पंक्तियां नदी के दो कूलों की तरह हैं। अर्थ की मीठी धारा दो पंक्तियों के बीच में बहती है, लेकिन सच्चा आस्वाद तभी आता है जब दोनों कूल शिल्पानुकूल हों। दोहे का शिल्प तेरह ग्यारह की मात्राओं में चलता है, लेकिन कोई भी दोहाकार मात्राएं गिनकर दोहा नहीं लिखता। हर काव्य-संस्कृति का एक शैल्पिक-छांदिक अनुशासन होता है, जो विरासत के तौर पर प्राप्त होता है। शब्दों की अंतर्लय और उनका सरल-सहज प्रवाह श्रवण-सत्संग से आता है। आजकल हिंदी में ख़ूब ग़ज़लगोई हो रही है और शायर दोहे लिख रहे हैं। मैंने पाया है कि बड़े-बड़े शायर तेरह-ग्यारह का गणित, ग़ज़ल-गूंज में बिसरा देते हैं, उसी तरह हिन्दी के वर्णिक और मात्रिक छन्दों के रियाज़ी, बहर के आंतरिक संगीत को नहीं समझ पाते। इसके लिए ज़रूरी है सत्संग। अच्छा है कि शशिकांत जी ने बहर के उस्तादों की सोहबत की।

—चल एक सेर और सुनाय दै!

—शशिकांत कहते हैं, ’दिन तो फिर भी कट जाता है, सांझ ढले जी घबराता है।’ है न बढ़िया, दिन भर लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो! सांझ ढले तो बेचैन मुन्ना भाई हो जाओ।

 


 


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