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मन धडक़नों का उत्सव मनाता है

man dhadkano kaa utsav manaataa hai

 

 

 

 

 

 

 

मन धडक़नों का उत्सव मनाता है

(अपने जन्म-दिन पर अपने छात्रों के लिए वसंत की कक्षा)

माघरचित शिशुपालवधम्

श्लोक संख्या छ: बटा दो!

छात्रो! ध्यान इधर रखो

शेष हर ओर से हटा दो!!

कृष्णजी देख रहे हैं बसन्त का आना,

देखो, उन्होंने ऋतु को कैसे पहचाना!

 

‘नव पलाश पलाश वनं पुर:

स्फुट पराग परागत पंकजम्

मृदु लतान्त लतान्त मलोकयत्

स सुरभिं सुरभिं सुमनो भरै:।’

अर्थात्,

वृक्षों पर आ रहे हैं नए नए पात।

पूरा पलाश का जंगल सुगंधित है,

तालाब कमल पुष्पों से आच्छादित है।

रंगत बदल गई है दिग्दिगन्त की,

अर्थात्! ऋतु आ गई है बसन्त की।

छात्रो, जब बसंत ऋतु आती है,

तो युवा हृदयों में मादकता छाती है।

दिल झूमने लगते हैं

टेसू फूलने लगते हैं

कलियां बन जाती हैं फूल,

वातावरण में महकती है केवड़े की धूल।

कोयल की खंजरी निकल आती है,

आमों की मंजरी निकल आती है।

दूर तक दीखती है पीली पीली सरसों,

मन करता है बनी रहे बरसों।

जब बसन्त आता है,

मन धडक़नों का उत्सव मनाता है।

भावनाओं को उंगली पर नचाता है।

कनपटी में सन्नाता है।

तितली अपने तितले को

प्रेम-पत्र लिखती है,

भंवरा अपनी भंवरी को

मुग़ल गार्डन ले जाता है।

मन गार्डन गार्डन हो जाता है।

छात्रो! व्हैन स्प्रिंग कम्स,

अंदर बजने दो ड्रम्स!!!

 


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