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  • चौं रे चम्पू
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  • माई भागो और नलवा
  • —चौं रे चम्पू! कहां गायब ऐ, बताइबे कूं कोई बात नायं का?
    —बातें तो घनेरी हैं। कौन सी छोटी मगर काम की बात बताऊं, ताकि फ़ोन पर कम पैसे लगें! पिछला सप्ताह खूब घूमने-फिरने का रहा, कॉफ़्स हार्बर की साफ-सुथरी समुद्री लहरों की ललक! वहां से यूलांग गांव के विस्तृत फलक। टिम परिवार की मेहमाननवाज़ी। डोरिगो के जलप्रपात और सघन रेन-फॉरेस्ट, जिनके बारे में कहा जाता है कि धरती इन्हें कम्बल की तरह ओढ़कर सुखपूर्वक लेटी हुई है। आंखों को ख़ूब तृप्ति मिली, लेकिन मन को तृप्ति मिली वूलगूल्गा जाकर।
    —व्हां का हतो?
    —वूलगूल्गा कॉफ़्स हार्बर से छब्बीस किलोमीटर दूर एक कस्बा है। आबादी लगभग पांच हज़ार। आधी आबादी सिखों की। तीन-तीन गुरुद्वारे हैं। अपनी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखे हुए हैं यहां के लोग। जिस गुरुद्वारे में हम गए थे, वह भारत के आम गुरुद्वारों से ज़्यादा भव्य था।
    —अच्छा जी!
    —हां चचा! सरदार गुरबचन सिंह ने बताया कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में, पंजाब के नवाज़शहर से, एक सिख परिवार, केले के खेतों में काम ढूंढते हुए यहां आया था। इन्होंने धीरे-धीरे अपने परिचितों, परिजनों को भी यहां बुला लिया। तब से अनेक पीढ़ियां हो गईं इन परिवारों की। गुरद्वारे के सामने पंजाबी स्कूल है। पंजाबी भाषा सीखना हर बच्चे के लिए अनिवार्य है। पर चचा, आज के इंटरनेट युग में बच्चे कोई अनिवार्यता मानते हैं क्या? इसलिए, नई पीढ़ी के सामने धर्म के उन तत्वों को रखा गया जो उन्हें आज सार्थक लगें। गुरुद्वारे के मुख्य प्रांगण में दो घुड़सवारों की मूर्तियां हैं! एक माई भागो की, दूसरी हरीसिंह नलवा की। इनकी मूर्तियां आपको भारत के गुरुद्वारों में नहीं मिलेंगी। मेरी समझ से ये इसलिए लगाई गईं हैं क्योंकि दोनों के व्यक्तित्व दो संदेश देते हैं। माई भागो का संदेश है ‘लड़का-लड़की में समानता’ और हरीसिंह नलवा का ‘धार्मिक सहिष्णुता’। नलवा ने अनेक मस्जिदों, मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था। दोनों ने अपने देश के कट्टपंथियों से मुकाबला किया और एक प्रगतिशील नज़रिया अपनाया था। ऑस्ट्रेलिया में अपनी नई पीढ़ियों को आकृष्ट करने के लिए धर्म की ऐसी व्याख्या यहां सफल सिद्ध हुई है चचा! क्या समझे?

    wonderful comments!

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