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  • (एक मज़दूर महिला के साथ जब किया गया दुर्व्यवहार)

    20110517 Mamla ye akele...

    फावड़े ने

    मिट्टी काटने से इंकार कर दिया

    और बदरपुर पर जा बैठा एक ओर।

    ऐसे में तसले को मिट्टी ढोना

    कैसे गवारा होता?

    काम छोड़ आ गया फावड़े की बगल में।

    धुरमुट की क़दमताल. . . रुक गई,

    कुदाल के इशारे पर तत्काल,

    झाल ज्यों ही कुढ़ती हुई

    रोती बड़बड़ाती हुई

    आ गिरी औंधे मुंह रोड़ी के ऊपर।

     

    —आख़िर ये कब तक?

    कब तक सहेंगे हम?

    ग़ुस्से में ऐंठी हुई

    काम छोड़ बैठ गईं गुनिया-वसूली भी

    इंर्टों से पीठ टेक,

    सिमट आया नापासूत कन्नी के बराबर।

    गारे में गिरी हुई बाल्टी तो

    वहीं-की-वहीं खड़ी रह गई ठगी-सी।

    सब्बल जो बालू में धंसी हुई खड़ी थी,

    कई बार ज़ालिम ठेकेदार से लड़ी थी।

     

    —मामला ये अकेले

    झाल का नहीं है धुरमुट चाचा!

    कुदाल का भी है

    कन्नी का, वसूली का,

    गुनिया का, सब्बल का

    और नापासूत का भी है,

    क्यों धुरमुट चाचा?

    फावड़े ने ज़रा जोश में कहा।

     

    और ठेक पड़ी हथेलियां

    कसने लगीं – कसने लगीं

    कसती गईं – कसती गईं।

    एक साथ उठीं आसमान में,

    आसमान गूंज गया कांप उठा डरकर।

    ठेकेदार भाग लिया टेलीफ़ोन करने।

     

    wonderful comments!

    1. Rajesh Kumar Jun 7, 2011 at 3:12 am

      ये क़िस्सा नापासूत से लेकर .....कन्नी कुदाल का है समाज में एकजुटता की अनोखी मिसाल का है एक मज़दूर के खून पसीने और रोटी दाल का है औरतों पर अत्याचार ? मसला मलाल का है इस देश में ,ये वाक़या , हर दिन हर साल का है कवि का अंदाज़ -ए-बयाँ वाक़ई कमाल का है मामला ये अकेले झाल का नहीं ...................

      1. ashokchakradhar Jun 7, 2011 at 7:58 am

        अच्छा विस्तार किया है राजेश जी।

        1. Rajesh Kumar Jun 8, 2011 at 6:45 am

          हौसला आफज़ाई के लिए शुक्रिया . आदाब

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