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लल्ला जिन्दगी की बात कर

लल्ला जिन्दगी की बात कर

 

—चौं रे चम्पू! है कोई दुकान, जहां उमर खरीदी जाय सकै?

—अरे वाह चचा! अब आपको इस बुढ़ापे में उम्र ख़रीदने की फिकर हुई है, ये जानकर मुझे अच्छा लगा। छोटा हूं पर आपको आशीर्वाद देता हूं कि प्रतिदिन ऊर्जाओं को प्राप्त करते हुए सौ शरद, सौ हेमन्त, सौ वसंत देखें। वैसे जिस तरह की आपकी दिनचर्या है, सवा सौ हेमंत-वसंत भी देख सकते हैं। ये भी शुभकामनाएं रखता हूं कि कर्म करते करते हुए जिएं। उम्र को घसीटने में क्या रखा है।

—सो तो ठीक है लल्ला। आयु होय चंचल और मौत होय क्रूर! बचपन अज्ञान में निकर गयौ। जवानी चंचलता में बीत गई। अब कछू स्थिरता के ताईं उमर चइऐ।

—चचा, आप मेरी तरह तो हैं नहीं। पैर में चक्कर। आज यहां, कल वहां। न खाने का समय, न सोने का। सौ तरह के तनाव, सौ तरह के व्यसन। आप बगीची पर अपने पट्ठों के साथ चकाचक काम कर रहे हैं। नियमित जीवन जीते हैं। शिष्यों से भी भांति-भांति की कपालभाति सीखते हैं। नादन शिष्य भले ही छोड़ दें पर आप अपना चिंतनजन्य सूर्य नमस्कार नहीं छोड़ते। शुद्ध-अशुद्ध का, करणीय-अकरणीय का ध्यान रखते हैं, मरणीय कहां से हो सकते हैं? आप आदरणीय हैं, फादरणीय हैं, लेकिन एक दिन तो चादरणीय होना ही पड़ेगा। उस चादर से मुक्ति कहां है!

—अरे, मौत की बात मत कर लल्ला! जिन्दगी की बात कर। हमऊं जानैं हैं कै नद्दी की तरियां उमर ऊ बहती चली जाय रई ऐ।

—तो उस उम्र पर कैसे बांध लगाओगे चचा, जो बहती जा रही है। उम्र का पानी एक जगह इकट्ठा नहीं कर सकते। अरे हां, मुझे एक जगह याद आई जहां उम्र कम करने का निदान-साधन है।

—बता, बता! जल्दी बता।

—चचा, एक अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के लिए त्रिनिदाद गए थे। सम्मेलन ख़त्म हो गया तो प्रेम जनमेजय वहां से टुबैगो ले गए। टुबैगो एक छोटा सा द्वीप है। छोटे से हवाई जहाज से गए थे। फिर जी, एक बड़े पानी के जहाज पर चढ़े और समन्दर में अन्दर की ओर चल दिए। इतनी दूर चले कि चारों ओर समन्दर ही समन्दर दिखाई दे और बीच समन्दर में वो बड़ा जहाज रुक गया। उससे लगी हुई थी एक छोटी बोट। हमसे कहा गया कि अब इस बोट में बैठो। अब बोट में बैठकर फिर समन्दर के अन्दर चले। चलते गए जी चलते गए। अचानक स्थिर-शांत जल देता है चचा। ऐसे जैसे स्विमिंग पूल हो और पता लगा कि इस जगह का नाम है ‘नायलॉन पूल’। इसके बारे में कहा जाता है कि यहां डुबकी लगा लो तो उम्र दस साल कम हो जाती है और सचमुच चचा, बड़े-बड़े विद्वान लेखक अपने साथ थे। जैसे ही नरेन्द्र कोहली कूदे तो आदरणीया मधुरिमा कोहली मधुरिम हो गईं। विनोद संदलेश के कंधे पर उनकी पत्नी मधु सवार। इतना आनन्दकारी मनोरम दृश्य। प्रेम जनमेजय अपनी पत्नी के साथ भरतनाट्यम कर रहे थे। पानी में कुछ ऐसी थिरक थी कि अंग-अंग फड़कने लगे। और हम, हम तो सबके फोटो खींचने में लगे हुए थे। साथ में होतीं आपकी बहूरानी तो हमें भी अच्छा लगता। खूब नहाए साहब, उस निर्मल जल में। नीचे कोमल-कोमल बालू का प्यारा स्पर्श। बाहर निकले तो वाकई ऐसा लगा जैसे दस साल उम्र कम हो गई है। सब प्रसन्न, सबके चेहरे पर एक दिव्य ज्योति, अद्भुत अलौकिक आभा।

—तो लल्ला टिकट कटाय दै वहां की।

—बस चचा, किराया सुन लिया तो उम्र दस साल बढ़ जाएगी आपकी। लाख-डेढ़ लाख से कम में नहीं आएगी। टिकिट का सदमा तनावग्रस्त कर देगा। इसलिए कहो तो यहीं के किसी स्वीमिंग पूल में एक डुबकी लगवा दूं। पर क्या करें, डीडीए के अधिकांश स्वीमिंग पूल, इस साल चालू ही नहीं हुए, लाइसेंस ही नहीं मिले। मैं भी तड़प रहा हूं। जसोला का स्वीमिंग पूल शुरू हो जाए तो यहीं पर नायलॉन पूल का मज़ा लिया जाए। क्या ख़याल है चचा?

 


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