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    क्या है दूसरी थैली तैयार करो

     

    —चौं रे चम्पू! आजकल रस्ता में पड़े भयै करोड़न रुपैया मिल रए ऐं, तोय मिल जायं तौ काकरैगौ?

    —पिछले दिनों मैंने एक लतीफ़ा सुना था। बंता ने संता से कहा कि अगर मुझे सड़क पर सौ रुपएपा जाएं तो मैं आधे भगवान को चढ़ाऊंगा। संता बोला बड़ा नेक ख़्याल है। बंता को एक दिनसड़क पर लावारिस पड़ा हुआ पचास का नोट मिल गया। नोट जेब में रखते हुए बंता ने ऊपर देखा और भगवान से कहा— तेरा बहुत-बहुत शुक्रिया, ये और अच्छा रहा कि तूने अपना कमीशन पहलेही काट लिया। यानी बंता ने भगवान से फिफ्टी परसेंट देने का जो वादा किया था उससे वहमुकर गया और पूरा हंड्रैड परसेंट अंटी में दबा लिया। अब मान लीजिए चचा कि संता भीपीछे-पीछे आ रहा था और उसने यह दृश्य देख लिया। उसने अपनी ईर्ष्याजन्य संतई से वहां हल्ला मचा दिया कि बंता को अभी-अभी पचास का नोट मिला है, किसी का गिरा तो नहीं? भीड़में से पचास रुपए के पचास दावेदार आ जाएंगे। मेरा गिरा था, मेरा गिरा था। जिसकी गुहार सबसेज़्यादा दयनीय और सच्ची लगे, वह पचास का नोट उस नकली दावेदार को वापस करना पड़सकता है। कहने का मतलब ये है कि सौ-पचास रुपए के दावेदार तो आ सकते हैं पर लाखों याकरोड़ों अगर अचानक मिल जाएं तो उसका असली दावेदार भी सामने नहीं आएगा। मुझे तोइसलिए नहीं मिल सकते क्योंकि दिल्ली में अभी चुनाव नहीं हो रहे।

    —वोई तौ मैं पूछ रह्यौ ऊं कै जाकौ पइसा ऐ वो बतावै चौं नायं कै मेरौ ऐ, मोह नायं पइसा में?

    —चचा, ये पैसा मोह त्याग कर निकाला जा रहा है। त्यागमयी भावना से बांटने के लिए, भेजा जारहा होगा। किसने भेजा, कहां के लिए भेजा गया, यह बात उस इलाके के संता और बंता सबजानते हैं,

    लेकिन न तो इलाके के संता ईर्ष्याजन्य संत हैं

    और न बंता किसी का कोई बनता कामबिगाड़ना चाहता है। करोड़ दो करोड़ तो दाता की दाढ़ में अटके हुए तिनके के बराबर हैं, जो डकारआने से पहले टूथपिक मुंह में डाल कर निकाल दिया जाता है। मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने अगर पकड़ भी लिया तो चला जाएगा सरकारी ख़जाने में। और चूंकि पहले से किसी को मालीमहै इसलिए पुलिस भी भगवान के साथ फिफ्टी-फिफ्टी नहीं कर सकती। देश का तो कोई नुकसाननहीं हुआ न!

    —चौं, गरीब लोगन कूं मिलतौ, तौ फ़ायदा होतौ उनकौ!

    —हां, चचा। ये तो है। सुल्ताना डाकू भी पहले लूट-पाट करके पैसा बांटा करता था और जनता मेंहीरो बन जाता था, पर ये आधुनिक डकैती-कला यह सरेआमवादी सुविधा प्रदान नहीं करती।  लूटका माल श्रेय लेकर सरेआम नहीं बांटा जा सकता, क्योंकि चुनाव आयोग के पक्षियों और अन्यदलीय प्रतिपक्षियों की नज़रें सुल्तानों और सुल्ताना डाकुओं पर हैं।

    —करोड़न रुपइया ते पल्ला झारिबे बारे निरमोही अपने देस में ई ऐं लल्ला!

    —हां ऐसे त्यागी भारत में ही मिलते हैं। धन बाहुबलियों का, चुनाव के छलियों का। पुलिस अबतक जिनके यहां पहरा देती थी, उनका कुछ तो लिहाज रखेगी। नाम क्यों बताए! चचा, ये तोदस-पन्द्रह घटनाएं ही सामने आई हैं। जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां मनुष्यों से ज़्यादापैसा यात्राएं कर रहा है। हवाई जहाज में, रेलगाड़ी में, कार में और जैसे-जैसे गंतव्य के निकटआता जाता है, सवारी छोटी होती जाती है। मोटरसाइकिल से, साइकिल से, बैलगाड़ी से गंतव्यतक बीज की तरह बिखर जाता है पैसा, वोटों की फसल लहलाएगी, इस कामना के साथ। जोपकड़े गए वे मुस्कुरा रहे हैं कि नाम नहीं आया। क्या है दूसरी थैली तैयार कर दो। चुनाव केस्वयंवर में पैसा सड़क पर बिखराते हुए थैलियां ख़ाली कर रहे हैं। भर लेंगे जब चुनाव की बारातगुज़र जाएगी। क्या है चचा, भारत एक सम्पन्न देश है और करोड़, दस करोड़, बीस करोड़ के रोडपर मिलने से चकित नहीं होना चाहिए। चट्टे मियां भी ख़ुश, बट्टे मियां भी ख़ुश।

     

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