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    कुछ तो मिलेगा परदे हटा के देखो

    (दृश्य और अदृश्य कितने ही परदे हैं समाज में, उन्हें हटा कर देखने का कौशल चाहिए।)

     

    ये घर है

    दर्द का घर

    परदे हटा के देखो,

    ग़म हैं

    हंसी के अंदर,

    परदे हटा के देखो।

     

    लहरों के

    झाग ही तो,

    परदे बने हुए हैं,

    गहरा है ये समुंदर,

    परदे हटा के देखो।

     

    नभ में

    उषा की रंगत,

    चिडि़यों का

    चहचहाना,

    ये ख़ुशगवार मंज़र,

    परदे हटा के देखो।

    अपराध और सियासत

    का

    इस भरी सभा में

    होता हुआ स्वयंवर,

    परदे हटा के देखो।

     

    एक ओर है

    धुआं सा,

    एक ओर है

    कुहासा,

    किरणों की

    डोर बनकर,

    परदे हटा के देखो।

     

    ऐ ‘चक्रधर’ ये माना,

    हैं ख़ामियां सभी में,

    कुछ तो मिलेगा

    बेहतर,

    परदे हटा के देखो।

     

     

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