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कटोरे की तरफ़ देखा तक नहीं

चौं रे चम्पू

—चौं रे चम्पू! का सोच में पड़ौ ऐ रे?

—चचा! मैं कुबेर जी के जाने के बाद उनकी पांच बिल्लियों के व्यवहार पर हैरान हूं। मीडियाकर्मी, कवि-लेखक, चित्रकार कुबेर दत्त विद्रोही स्वभाव के व्यक्ति थे। मेरे अनन्य! घनघोर प्रेम रखते थे, घनघोर शिकायतें भी। दिव्य होने के उपरांत रात के बारह बजे के बाद वे फोन मिलाते थे। कई बार तो मन करता था कि न उठाऊं, क्योंकि जानता था कि बातचीत एक घंटे से पहले समाप्त नहीं होगी। उनके प्रति सम्मान और अपनी ओढ़ी हुई शालीनता के रहते मैं उनका फोन काट न पाऊंगा। वे साहित्य-सरोकारों पर व्यापक समय-नापक विमर्ष करेंगे और इस लौकिक जगत के ईर्ष्यालु, लालची और द्वेषपूर्ण लोगों को गरियाएंगे। उनके अवचेतन से भूत-भांति के तत्व निकल-निकल कर आएंगे और जब अगली सुबह बात होगी तो सब कुछ भूल जाएंगे। रात की बातचीत में भी कई बार ब्रेक लेते थे, ‘एक मिनिट होल्ड करना, ज़रा एक सिगरेट और सुलगा लूं’। फिर बातचीतों से धुंआ उठने लगता था।

—तू बिल्लीन की का बात करि रह्यौ ओ?

—उस रात वे घर में अकेले नहीं थे, उनके साथ थीं उनकी पांच बिल्लियां। दूरदर्शन से अवकाश प्राप्त करने के बाद कुबेर घर पर ही रहना पसन्द करते थे। पेंटिंग बनाते थे। शास्त्रीय गायन सुनते थे और मन करता था तो अपनी बिल्लियों को अपना शास्त्रीय गायन सुनाते थे। पिछले छः महीने से इस रूपवान प्राणी ने दाढ़ी बढ़ा ली थी और बासठ की उम्र में ही इस दुनिया से गाड़ी बढ़ा ली।

—भयौ का! कैसे गए?

—चचा, कमलिनी जी दूरदर्शन के लिए कोई ऑडीशन लेने हैदराबाद गई हुई थीं। उस रात लगभग दस बजे उनकी सामान्य, पारिवारिक, घरेलू बातचीत हुई थी। एक-डेढ़ बजे कुबेर जी ने मध्यप्रदेश के किन्हीं सज्जन से साढ़े सात मिनट बात की। उसके बाद किसी को कुछ पता नहीं। वे थे और उनके साथ अंदर से बंद घर में थीं पांच बिल्लियां।

—पांच कहां ते आय गईं?

—पहले फ़क़त एक बिलौटा हुआ करता था, जिसे कुबेर जी ने एक ट्रक से बचाया था और घर ले आए थे। नाम रखा उसका बादल। बादल अपने लिए कहीं से बुच्ची को ढूंढ लाया। इन दोनों के तीन शावक हुए, जिनके नाम रखे गए रेशम, सिल्की और चंदन। एकांत में इन पांचों बिल्लियों की उछल-कूद को व्यवधान न मानते हुए वे अपने रचनात्मक कार्यों में तल्लीन रहते थे। हाल ही में छतरपुर मंदिर के पास के एक हैरिटेज होटल ने ढाई लाख में उनकी पेंटिंग्स ख़रीदी थीं। बिल्लियां उनके सृजन की साक्षी रही हैं। बिल्लियों के दुख को देखकर मैं दुखी और हैरान हुआ चचा।

—बिल्ली कैसै दुखी भईं?

—अगले दिन कमलिनी जी लौटीं। द्वार खटखटाने पर न खुला तो तुड़वाना पड़ा। शयन-कक्ष तक गईं तो देखा कि कुबेर जी गहरी नींद में थे, बिल्ली बुच्ची सिरहाने बैठी थी और बिलौटा बादल पैताने की तरफ़। रेशम, सिल्की और चंदन मातम-सा मनाते हुए गुमसुम और उदास थे। एशट्रे, सिगरेट के टोंटों से लबालब भरी हुई थी। डेढ़ बजे के बाद भी जब नींद न आई होगी तो शायद उन्होंने एक के बाद एक सिगरेट पी होंगी और इन बिल्लियों के साथ सुख-दुख संवाद किया होगा। बहरहाल, कमलिनी जी के आने पर बिल्लियां कोई धीरज नहीं बंधा पाईं। मैं जब घर पहुंचा तो वहां मित्र रवि जैन, नलिनी जैन, उनकी बिटिया ऋचा, लेखक पंकज सिंह और कुछ परिवारी जन विह्वल कमलिनी जी की देखभाल कर रहे थे। रवि जी ने घटना-क्रम बताने के बाद बिल्लियों के भोजन का बड़ा सा कटोरा दिखाया जो कुबेर जी की एशट्रे की तरह भरा हुआ था। रवि जी ने बताया कि बिल्लियों ने कटोरे की तरफ़ देखा तक नहीं। बिलौटा बादल पार्थिव शरीर को तरह-तरह से निहार रहा था। बिल्ली बुच्ची शोक-मग्न लोगों के बीच उदास बैठी थी। कोई पड़ौसी एक ट्रे में शोकार्थियों के लिए चाय लेकर आया था। शोकार्थी संकोच के साथ चाय के गिलास उठा रहे थे। बादल आकाश की ओर देख रहा था। मैं बिल्ली भोजन के भरे कटोरे की ओर। देर रात की फ्लाइट से जब बिटिया कुंजू आई तो बुच्ची शायद उसे बता रही थी कि पिछली रात पापा ने हमारे भोजन का कटोरा तो भर दिया था पर जब उन्होंने पानी मांगा तो हम पांचों में से कोई दे नहीं पाया। सॉरी कुंजू!

—अब बस कर चम्पू!

 

 


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  1. उपमा एवं अनुपमा श्रीवास्तव |

    चंपू…. तौ सई में भिजो गयो मन की कोर-कोर…

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