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क्रिसमस ट्री पर झूलें गणेश

क्रिसमस ट्री पर झूलें गणेश

 

—चौं रे चम्पू! जे तेरे थैला में का ऐ रे?

—आपके लिए कपड़े लाया हूं चचा।

—अरे, जे लाल-लाल कपरा! हनुमान जी जैसी पोसाक हम थोरेई पहिरिंगे लल्ला!

—अरे चचा, हनुमान जी आकाश मार्ग से जड़ी-बूटी लाए थे, उन्हीं की तरह आज आपको सांता-क्लॉज़ बनना होगा। ये दाढ़ी भी लगानी पड़ेगी।

—समझ गए लल्ला! सांता-क्लौज हम जानैं ऐं।

—क्या जानते हैं आप? चचा, सांता-क्लॉज़ रेंडियर नाम की अपनी बग्घी पर बैठकर बादलों के ऊपर हवा में उड़ते हुए बच्चों के लिए उपहार लाते हैं। फिर हर घर की चिमनी में प्रवेश करते हैं, बच्चों के सिरहाने उपहार रखकर चले जाते हैं। बच्चे जगे रहते हैं, लेकिन झूठ-मूठ को आंख मूंद लेते हैं कि अगर हमने आंख खोलीं तो शायद सांता न आएं! और सांता के कपड़े पहनकर उस घर का कोई व्यक्ति उपहार रख देता है। ये काम आज आपको मेरे घर में करना है।

—भौत भड़िया लल्ला! ज़रूर करिंगे। जे तैनैं अच्छी कही। हनुमान जी और सांता-क्लोज एक जैसे ई ऐं!

—हां, एक जैसे इसलिए हैं कि हनुमान मच्छर बनकर सुरसा के मुंह में घुस गए थे। आप छोटे से होकर चिमनी के रास्ते आ जाना। पर हमारे देश में तो चिमनी लगाने का रिवाज बहुत कम है। आमतौर से खाना घर के आँगन में चूल्हा लगा कर पकाया जाता है। धुआं आंगन के ऊपर उठता है, घर के अन्दर की रसोई से नहीं। यहां उतना शीत भी नहीं होता। सांता-क्लॉज़ बर्फीले प्रदेशों से उड़ते हुए आते हैं।

—ठीक ऐ! जैसौ कहैगौ, करिंगे। जे कित्ती अच्छी बात ऐ बच्चन के ताईं।

—चचा, आप जानते हैं कि बच्चे फैंटैसियों में जीते हैं। माता-पिता द्वारा बताई गई गाथाओं पर भरोसा करते हैं। जब बड़े हो जाते हैं तो वही गाथाएँ अपने बच्चों को परोसते हैं। आप जानते हैं कि मेरा परिवार अब ग्लोबल हो चुका है। मेरे दामाद अमरीकी मूल के अमरीकी हैं और मेरे बेटे की मित्र ऑस्ट्रेलियाई मूल की ऑस्ट्रेलियन है। धीरे-धीरे दोनों हिन्दी सीख रहे हैं। क्रिसमस उनकी दीपावली है। आप तो बस अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी और पुख्ता ब्रजभाषा में बच्चों को उपहार देना।

—तो लल्ला! उपहार तौ हम लाए नायं कछू!

—उसकी चिंता मत करिए, दो दिन से शॉपिंग चल रही है। मौसा-मौसी, चाचा-चाची, बूआ-फूफा के बच्चे, हमारे मित्रों के बच्चे और हमारी बिटिया की सहेलियों के बच्चे आएंगे। सारे के सारे बड़े बच्चे आपके लिए बच्चे ही हैं। मेरे लिए उपहार ले आना, बाकी तोहफों का एक ढेर क्रिसमस ट्री के नीचे सजा दिया है। हमारे यहां तीज त्यौहार के मौके पर बच्चों को पैसे या कपड़े देने का रिवाज चला आ रहा है, ये तरह तरह के उपहार वाली प्रथा पश्चिम से आई है। ख़ैर, क्रिसमस ट्री पर वैसी ही झालरें लगेंगी आज, जैसी दीवाली पर पूरे घर में लगाई जाती हैं और उसमें तरह-तरह के खिलौने टांगे जा चुके हैं। गोल-गोल कांच के घंटू और तिकोने रंगीन लकड़ी के टुकड़े, घंटियां और तरह-तरह के पशु-पक्षियों के कट-आउट। मज़े की बात क्या है कि क्रिसमस ट्री के सबसे ऊपर झूल रहे हैं चीन के बने हुए गणेश जी और हनुमान जी।

–क्रिसमस ट्री कैसै बनामैं?

–फर और डगलस नाम के पेड़ों से ये बनाया जाता था। अब तो बाज़ार में तीन-तीन सौ रुपए में प्लास्टिक के बने हुए लम्बे विराटकाय क्रिसमस ट्री मिलते हैं। मेडइन चाइना। भारतीय मध्य वर्ग में बड़ी तेज़ी से क्रिसमस के त्यौहार को भी मनाने का चलन चल पड़ा है।

—तो बुराई का ऐ लल्ला?

—बुराई कौन कह रहा है चचा! यह तो अच्छा है कि हम इस धरती पर मनाए जाने वाले हर त्यौहार में अपनी शिरकत करें और आनन्द का कोई भी क्षण खोने न दें। गणपति क्रिसमस ट्री पर झूलते हुए बुद्धि फैला रहे हैं। हनुमान जी बल-पराक्रम ला रहे हैं। यीशु मसीह के अनुयायी संत सांता-क्लॉज़ बच्चों के लिए तोहफ़े ला रहे हैं। सांता-क्लॉज़ कल दिल्ली सरकार के लिए भी तोहफ़ा लेकर आने वाले हैं। अरविन्द केजरीवाल भी खुश रहें, और क्या!

 


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